शनिवार, नवंबर 29, 2008

अचानक आया तूफ़ान

बुधवार को शाम को अचानक जब मुंबई में होने वाले आतंकवादी हमले का पता चला तो वह मेरे सोने का समय था. कम्प्यूटर के काम मैं अधिकतर सुबह जल्दी उठ कर करता हूँ, शाम को काम से घर आकर मुझे कम्प्यूटर के सामने बैठना अच्छा नहीं लगता, संगीत सुनना और कुछ किताब या पत्रिका पढ़ना अधिक भाते हैं.

पर उस दिन शाम को थाईलैंड के समाचारों से परेशान था. दिसम्बर के प्रारम्भ में बैंकाक में बहुत बड़ी कोंफ्रेंस का आयोजन करने में कई महीने से हम लोग जुटे हुए थे, जब मालूम चला कि सरकार विरोधी दलों ने बैंकाक के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर कब्ज़ा कर लिया है, तो बहुत घबराहट हुई कि अब क्या होगा, सारा आयोजन और मेहनत तो व्यर्थ जायेंगे ही, साथ ही हज़ारों यूरो का नुकसान होगा. तो शाम को घर आ कर भी मन बार बार बैंकाक की स्थिति के बारे में सोच रहा था, और रात को सोने से पहले सोचा कि कम्प्यूटर पर देखूँ कि वहाँ कि स्थिति में कुछ सुधार आया या नहीं. समाचार देखने लगा तो "मुंबई में आतंकवादियों का हमला" के समाचार पर दृष्टि पड़ी.

खोज कर तुरंत आईबीएन सात की चैनल मिली तो समाचार सुनने लगा. इस तरह घुस कर आंतकवादियों ने निर्भय हो कर कितने लोगों को इस तरह मार दिया जान कर रौंगटे खड़े हो गये. उस रात को सोया कुछ देर ही, बार बार उठ कर कम्प्यूटर के आगे बैठ जाता यह जानने के लिए कि आतंकवादियों को पकड़ा गया या नहीं. सुबह होते होते मेरा भी बुरा हाल था. रात में मुंबई में रहने वाले कुछ सम्बंधियों से बात भी हुई. भतीजी जो ताज होटल में काम करती है, वह ठीक है यह जान कर चिंता कम हुई पर लग रहा कि मानो युद्ध के बीच में बैठा हूँ. सोचा कि दिल्ली या अन्य शहरों में घरों में बैठे भारतीय भी मेरी तरह ही टीवी पर देख कर इस तरह विचलित हो रहे होंगे.

बृहस्पतिवार को सुबह काम पर जाते हुए गाड़ी चलाते हुए लगा कि मेरी हालत ठीक नहीं थी, युद्ध या भयानक घटनाओं में फँसे लोगों को जिस तरह का धक्का लगता है, उसके क्या लक्षण होते हैं, मालूम था और यह समझ आ रहा था कि वही लक्षण मुझमें भी थे. भीतर से स्तब्ध महसूस करना, अपने शरीर से स्वयं को अलग महसूस करना, लगे कि तैर रहे हों या उड़ रहे हों, जैसे कोई सपना हो, रुलाई आना जैसा हो रहा था. यह भी समझ आ रही थी कि इस हालत में गाड़ी चलाना ठीक नहीं था. खैर काम पर पहुँच कर सारा दिन भी करीब करीब इंटरनेट पर मुंबई में क्या हो रहा है इसी बात को देखने सुनने में निकला, काम तो कम ही हुआ. शाम को इतालवी राष्ट्रीय रेडियो वालों नें टेलीफ़ोन पर साक्षात्कार करने के लिए कहा तो उनसे साक्षात्कार में क्या कहा कुछ याद नहीं.

पर रात को थक कर इंटरनेट पर टीवी देखते देखते सो गया. कल शुक्रवार को सुबह सो कर उठा तो लगा कि सामान्य हो गया था, हालाँकि मुंबई में क्या हुआ इसका ध्यान बार बार होता था. आज शनिवार को आखिरकार आतंकवादियों पर काबू पा लिया गया. पिछले तीन दिनों में इतालवी टीवी भी समाचारों की शुरुआत मुबंई से ही कर रहे थे और समाचारों का अधिकाँश भाग इसी हमले की बात में निकलता था. आज भारत से लौटे इतालवी पर्यटकों के विभिन्न साक्षात्कार दिखाये गये. थके चेहरे वाली एक औरत नें ट्राईडेंट होटल की उस इक्कीस वर्षीय काम करने वाली युवती को याद करके धन्यवाद किया जिसनें इतनी कठिनाई में भी हिम्मत नहीं खोयी और विदेशी मेहमानों का ध्यान किया, उन्हें सहारा दिया. ट्राईडेंट के खाना बनाने वाले लोरेंज़ो जो अपनी पत्नी और छह मास की बच्ची के साथ सही सलामत घर वापस आ सके, की तस्वीरें और कहानी तो सारे विश्व में दिखायी जा चुकी हैं. आम लोगों ने किस तरह विदेशियों को ध्यान रखा इसकी बात कई लोगों ने की, सुन कर गर्व हुआ कि इतनी कठिन घड़ी में सामन्य भारतवासियों ने मेहमानों का ध्यान रखने की परम्परा का पालन किया.

आतंकवादी दुनिया में अपना संदेश पहुँचाने में सफ़ल रहे पर साथ ही पहली बार दुनिया ने भारत में आतंकवाद में खतरे की गम्भीरता को करीब से देखा. इससे पहले के बम फटते भी तो वह छोटा सा समाचार बन कर रह जाते थे, कोई उनकी गम्भीरता को ठीक से नहीं समझ पाता था. शायद अब पाकिस्तान में आतंकवादियों को अलग करने और उनका दमन करने का काम हो सकेगा? पिछले दिनों में भारतीय मुसलमान धर्म के विभिन्न जाने माने लोगों ने आतंकवाद और मौत के खेल खेलने वालों के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी, शायद इस घटना से भारतीय मुसलमानों में इस तरह के लोगों को अलग करने और उनके विरुद्ध बोलने की आवाज़ और बुलंद उठेगी.

इस लड़ाई में मरने वाले बेकसूर लोग और पुलिस वालों की मृत्यु के लिए दुख तो होता है पर साथ ही लगता है कि पुलिस वालों और अन्य सैना दलों को मीडिया से क्या कहा जाया, किस तरह सम्पर्क रखा जाये इस पर गम्भीरता से विचार करना होगा और भविष्य के लिए स्ट्रेजी बनानी चाहिये. बार बार कहना कि यह हो गया, वह गया, अब बस फाईनल हमला होगा, बगैरा जैसी बातें कुछ नौसिखियों सी लगीं.

आज सबसे अधिक चिंता तो इस बात की होती है कि इतना कुछ होने पर भी हमारे नेता कुछ नहीं सीखेंगे. हर बार की तरह इस बार ही हमारे नेता सब कुछ भूल कर एक दूसरे पर आरोपबाजी, वोट कैसे बनाये जायें, कैसे अपनी जेब भरी जायें जैसी बातों में मस्त हो जायेंगे, कुछ सबक नहीं लेंगे. यही भारत की सबसे बड़ी कमजोरी और दुर्भाग्य होगा.
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