शनिवार, दिसंबर 08, 2012

वियतनाम में बुद्ध धर्म


गौतम बुद्ध के उपरांत, कुछ सदियों में ही बुद्ध धर्म भारत और नेपाल से निकल कर पूर्वी और पश्चिमी एशिया में फ़ैल गया. वियतनाम में बुद्ध धर्म चीन से तथा सीधा दक्षिण भारत से, प्रथम या द्वितीय ईस्वी में पहुँचा. वियतनामी बुद्ध धर्म पर चीन से ताओ धर्म तथा प्राचीन वियतनामी मिथकों के प्रभाव दिखते हैं. आज करीब 80 प्रतिशत वियतनामी स्वयं को बुद्ध धर्म के अनुयायी मानते हैं.

बुद्ध धर्म के वियतनाम में पहुँचने के करीब पाँच सौ वर्ष बाद, भारत से हिन्दू धर्म का प्रभाव भी वियतनाम पहुँचा जो कि मध्य तथा दक्षिण वियतनाम के चम्पा सम्राज्य में अधिक मुखरित हुआ. वियतनाम में चम्पा साम्राज्य की राजधानी अमरावती, तथा अन्य प्रमुख शहर जैसे विजय, वीरपुर, पाँडूरंगा आदि में बहुत से हिन्दू मन्दिर बने जिनके भग्नावषेश आज भी वियतनाम के मध्य भाग में देखे जा सकते हैं. इस तरह से वियतनामी बुद्ध धर्म में हिन्दू धर्म का प्रभाव भी आत्मसात हो गया.

वियतनाम की आधुनिक राजधानी हानोई के उत्तर में बाक निन्ह जिले में स्थित निन्ह फुक पागोडा को वियतनाम का प्रथम बुद्ध संघ तथा मन्दिर का स्थान माना जाता है. कहते हैं कि प्राचीन समय में यहाँ पर भारत से आये बहुत से बुद्ध भिक्षुक रहते थे. इस पागोडा को लुए लाउ (Luy Lâu) पागोडा के नाम से भी जाना जाता है. पहाड़ों के पास, डुओन्ग नदी के किनारे बना यह पागोडा, प्राचीन दीवारों में बन्द लुए लाउ शहर से जुड़ा है, और बहुत सुन्दर है. पागोडा के प्रँगण में 1647 ईस्वी की बाओ निह्म मीनार बनी है जिसमें पागोडा के प्रथाम बुद्ध महाध्यक्ष के अवषेश सुरक्षित रखे हैं.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वियतनाम में कम्युनिस्ट शासन स्थापत हुआ जिसने धर्म को सार्वजनिक जीवन से निकालना चाहा और बौद्ध धार्मिक स्थान भी बन्द कर दिये, भिक्षुकों को जेल में डाला गया. 1986 के बाद धीरे धीरे शासन ने रूप बदला और धार्मिक संस्थानो को फ़िर से चलने की अनुमति मिली.

आज वियतनाम में प्राचीन बुद्ध मन्दिरों को सरकारी सहयोग मिलता है और पर्यटक उन्हें देखने जाते हैं. लेकिन बुद्ध धर्म की प्रार्थनाएँ अभी भी चीनी भाषा में हैं जिसे आम वियतनामी नहीं समझ पाते. इन प्रार्थनाओं में अमिताभ सूत्र तथा पद्म सूत्र सबसे अधिक प्रचलित हैं. इसी तरह बुद्ध मन्दिरों में प्रार्थनाओं को ध्वज पर लिखवा कर घर में रखने का प्रचलन है, पर यह प्रार्थनाएँ भी चीनी भाषा में ही लिखी जाती हैं.

बुद्ध मन्दिरों में विभिन्न बौद्धिसत्वों जैसे कि अमिताभ की मूर्तियाँ मिलती हैं.

साथ ही बुद्ध मन्दिरों में प्राचीन पूर्वज पूजा भी प्रचलित है जिसमें अगरबत्तियों के साथ साथ, लोग कागज़ की मानव मूर्तियों या नकली नोटों को भी जलाते हैं.

पूर्वज पूजा से ही जुड़ी है गुरु पूजा की परम्परा. हानोई में राजपरिवार के प्राचीन गुरुओं का "साहित्य मन्दिर" बना है, जहाँ विद्यार्थी इम्तहान में पास होने की प्रार्थना करने जाते हैं.

वियतनामी मन्दिरों में फोनिक्स के काल्पनिक जीव जो विभिन्न पशु पक्षियों के सम्मिश्रिण से बना है अक्सर दिखता है.

जापानी प्रभाव से विकसित हुए ज़ेन बुद्ध धर्म या थियन बुद्ध धर्म के भिक्षुक, लेखक तथा विचारक थिच नाह्ट (Thích Nhất Hạnh) अपने ध्यान योग और बुद्ध साधना की किताबों और प्रवचनों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं.

बुद्ध धर्म से जुड़ी मेरी एक वियतनाम यात्रा की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं.

(1) चीनी भाषा में लिखा प्रार्थना ध्वज

Buddhism in Vietnam - S. Deepak, 2010

(2) हानोई में बना गुरु पूजा का साहित्य मन्दिर

Buddhism in Vietnam - S. Deepak, 2010

(3) वियतनाम में मध्य भाग से कुछ बुद्ध मन्दिर

Buddhism in Vietnam - S. Deepak, 2010

Buddhism in Vietnam - S. Deepak, 2010

Buddhism in Vietnam - S. Deepak, 2010

(4) मन्दिर में चढ़ाने के लिए कागज़ के मानव व पशु जलाने की रीति

Buddhism in Vietnam - S. Deepak, 2010

Buddhism in Vietnam - S. Deepak, 2010

Buddhism in Vietnam - S. Deepak, 2010

(5) प्राचीन निन फुक पागोडा

Buddhism in Vietnam - S. Deepak, 2010

Buddhism in Vietnam - S. Deepak, 2010

Buddhism in Vietnam - S. Deepak, 2010

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बुधवार, नवंबर 21, 2012

फ़िर ले आया दिल .. यमुना किनारे

उम्र के बीतने के साथ पुरानी भूली भटकी जगहों को देखने की चाह होने लगती है, विषेशकर उन जगहों की जहाँ पर बचपन की यादें जुड़ी हों. ऐसी ही एक जगह की याद मन में थी, दिल्ली में यमुना किनारे की.

बात थी 1960 के आसपास की. मेरी बड़ी बुआ डा. सावित्री सिन्हा तब दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ कोलिज में हिन्दी पढ़ाती थीं. उनका घर था इन्द्रप्रस्थ कोलिज के साथ से जाती छोटी सी सड़क पर जिसे तब मेटकाफ मार्ग कहते थे, जो अँग्रेज़ो के ज़माने के मेटकाफ साहब के घर की ओर जाती थी जिन्होंने महरौली के पास के प्राचीन भग्नावशेषों को खोजा था और जहाँ आज भी उनके नाम की एक छतरी बनी है.

यमुना वहाँ से दूर नहीं थी, पाँच मिनट में पहुँच जाते थे. तब वहाँ घर नहीं थे, बस रेत ही रेत और कोई अकेला मन्दिर होता था. तभी वहाँ नया नया बौद्ध विहार बना था. वहीं रेत पर दिन में खेलने जाते थे या कभी शाम को परिवार वालों के साथ सैर होती थी.

बीस साल बाद, 1978 के आसपास जब सफ़दरजंग अस्पाल में हाउज़ सर्जन का काम करता था तो अपने मित्रों के साथ बौद्ध विहार के करीब बने तिब्बती ढाबों में खाना खाने जाया करते थे.

इस बार मन में आया कि उन जगहों को देखने जाऊँ. मैट्रो ली और आई.एस.बी.टी. के स्टाप पर उतरा. पीछे से बस अड्डे के साथ से हो कर, सड़क पार करके, यमुना तट पर पहुँचने में देर नहीं लगी. चारों ओर नयी उपर नीचे जाती साँपों सी घुमावदार सड़कें बन गयी थीं.

नदी के किनारे गाँवों और छोटे शहरों से आये गरीबों की भीड़ लगी थी, बहुत से लोग सड़क के किनारे सोये हुए थे, कुछ यूँ ही बैठे ताक रहे थे. उदासी और आशाहीनता से भरी जगह लगी, पर साथ ही यह भी लगा कि चलो बेचारे गरीबों को आराम करने के लिए खुली जगह तो मिली. वहाँ कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा चलाने वाले रैनबसेरे भी हैं जहाँ अधिक ठँड पड़ने पर रात को सोने के लिए कम्बल और जगह मिल जाती है, और दिन में खाने को भी मिल जाता है.

बैठे लोगों को पार करके नदी तक पहुँचा तो गन्दे बदबूदार पानी को देख कर मन विचट गया.

Pollution Yamuna river, Delhi

Pollution Yamuna river, Delhi

Pollution Yamuna river, Delhi

एक ओर निगम बोध पर जलते मृत शरीरों का धूँआ उठ रहा था. जगह जगह प्लास्टिक के लिफ़ाफे और खाली बोतलें पड़ी थीं.

Pollution Yamuna river, Delhi

दूसरी ओर छठ पूजा की तैयारी हो रही थी. नदी के किनारे देवी देवताओं की मूर्तियाँ रंग बिरंगे वस्त्र पहने खड़ी थीं. पानी में गहरे पानी में जाने से रोकने के लिए लाल ध्वजों वाले बाँस के खम्बे लगाये जा रहे थे. कुछ लोग नदी के गन्दे पानी में नहा रहे थे.

Pollution Yamuna river, Delhi

Pollution Yamuna river, Delhi

Pollution Yamuna river, Delhi

जिसे यमुना माँ कहते हैं, उसके साथ इस तरह का व्यवहार हो रहा है, उसमें लोग गन्दगी, कचरा, रसायन, आदि फैंक कर प्रदूषण कर रहे हैं. इसे धर्म को मानने वाले कैसे स्वीकार कर रहे हैं? यह बात बहुत सोच कर भी समझ नहीं पाया.

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पुराणों में यमुना नदी के जन्म की कहानी बहुत सुन्दर है. यमुना के पिता हैं सूर्य और माता हैं संज्ञा, भाई हैं यम. इस कहानी के अनुसार सूर्य देव के तेज प्रकाश तथा उष्मा से घबरा कर संज्ञा अपने पिता के घर भाग गयीं. उन्हें वापस लाने के लिए सूर्य के अपने प्रकाश के कुछ हिस्से निकाल कर बाँट दिये. सूर्य से ग्रहों के उत्पन्न होने की यह कथा, और संज्ञा तथा सूर्य की उर्जा से जल यानि जीवन तथा मृत्यू का जन्म होना, यह बातें आज की वैज्ञानिक समझ से भी सही लगती हैं.

पुराणों की अनुसार, गँगा की तरह यमुना भी देवलोक में बहने वाली नदी थी जिसे सप्तऋषि अपनी तपस्या से धरती पर लाये. देवलोक से यमुना कालिन्द पर्वत पर गिरी जिससे उसे कालिन्दी के नाम से भी पुकारते हैं और पर्वतों में नदी के पहले कुँड को सप्तऋषि कुँड कहते हैं. इस कुँड का जल यमुनोत्री जाता है जहाँ वह सूर्य कुँड के गर्म जल से मिलता है.

भारत की धार्मिक पुस्तकों में और सामान्य जन की मनोभावनाओं में पर्वत, नदियों और वृक्षों को पवित्र माना गया है. नदी में स्नान करने को स्वच्छ होने, पवित्र होने और पापों से मुक्ति पाने की राहें बताया गया हैं. इसलिए नदियों के प्रदूषण के विरोध में साधू संतो ने भी आवाज उठायी है. लेकिन राजनीतिक दलों से और आम जनता में इन लड़ाईयों को उतना सहयोग नहीं मिला है.

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यमुना के किनारे जहाँ बौद्ध विहार होता था वह सारा हिस्सा पक्के भवनों से भर गया है. जहाँ ढाबे होते थे वहाँ भी पक्के रेस्त्राँ बन गये हैं. जहाँ कुछ तिब्बती लोग बैठ कर ऊनी वस्त्र बेचते थे, उस जगह पर भीड़ भाड़ वाली मार्किट बन गयी है.

Pollution Yamuna river, Delhi

Pollution Yamuna river, Delhi

मन में लगा कि बेकार ही इस तरफ़ घूमने आया. जितनी मन में सुन्दर यादें थीं, उनकी जगह अब यह सिसकती तड़पती हुई नदी और सूनी आँखों वाले गरीबों के चेहरे याद आयेंगे.

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सोमवार, नवंबर 19, 2012

हिन्दी फ़िल्मों में मानसिक रोग और मानसिक विकलाँगता


बीमारियाँ और विकलाँगताएँ मानव जीवन का अभिन्न अंग हैं. हिन्दी फ़िल्मों और बीमारियों का नाता बहुत पुराना है. बीमारी, कष्ट, मृत्यू इन सब बातों से फ़िल्मों की कहानियों को भावात्मक मोड़ मिल जाते हैं. बीमारी के विषय पर बनी फ़िल्मों के बारे में सोचें तो मन में "दिल एक मन्दिर", "आनन्द", "सफ़र", "गुज़ारिश" और "कल हो न हो" जैसी न भूलने वाली फ़िल्में याद आ जाती हैं.

दूसरी ओर, कुछ फ़िल्मों में शारीरिक विकलाँगताओं से जुड़ी कहानियों को मानव जीवन के संघर्ष से जोड़ कर सुरुचिपूवक ढंग से दिखाया गया है. 1960 के दशक की "जागृति" और "दोस्ती" से ले कर कुछ माह पहले आयी "बर्फी" तक आप को हिन्दी फ़िल्म जगत से इसके कितने ही उदाहरण मिल सकते हैं. लेकिन साथ ही, हिन्दी सिनेमा ने विकलाँगताओं को अक्सर हँसी मज़ाक का विषय भी बनाया है जैसे कि अभिनेता तुषार कपूर जो अजीब से गूँगे युवक का पात्र निभाने के लिए प्रसिद्ध हो गये हैं और कई फ़िल्मों में इस तरह के पात्र को निभा चुके हैं.

एक ओर जहाँ कैंसर जैसी बीमारियों तथा शारीरिक विकलाँगताओं को अगर फ़िल्मी दुनिया में जगह मिली है, वहाँ मानसिक रोगों और विकलाँगताओं को हिन्दी फ़िल्म जगत ने किस तरह से दर्शाया है?

करीब छः वर्ष पहले मैंने हिन्दी फ़िल्मों में मानसिक रोगों के चित्रण के विषय पर लिखा था. इस विषय पर दोबारा लिखने का एक कारण है कि तबसे इस विषय पर कुछ नयी फ़िल्में भी बनी हैं. दूसरी बात यह कि पहले आलेख में बात केवल मानसिक रोगों की थी, दिमागी विकलाँगताओं की नहीं, जबकि मेरे विचार में इन दोनो बातों के बीच का अंतर अधिकतर लोगों को स्पष्ट समझ नहीं आता.

Mental illness and intellectual disabilities in Hindi films

मानसिक रोगों तथा मानसिक विकलाँगताओं के बीच का अंतर करना कभी कभी बहुत कठिन होता है. कई बार विकलाँगता किसी रोग का परिणाम होती है. फ़िर भी दोनो बातों में कुछ अंतर होते हैं. इस विषय पर बनी फ़िल्मों की चर्चा से पहले, इस अंतर की बात समझना आवश्यक है.

मानसिक रोगों तथा मानसिक विकलाँगताओं में अंतर

मानसिक रोग वह बीमारियाँ होती हैं जिनसे मानव के व्यवहार पर, उसकी भावनाओं पर असर पढ़ता है. इन बीमारियों का उपचार मनोरोग विशेषज्ञय दवाओं से या साइकोथैरेपी से करते हैं.

मानसिक रोग दो तरह के होते हैं - एक वे रोग जिसमें मानव अपने व्यवहार या भावनाओं पर नियन्त्रण नहीं कर पाता, पर उसमें समझ बूझ की क्षमता होती है. जैसे कि डिप्रेशन यानि गहरी उदासी या ओबसेशन यानि मन में किसी विचार का घर कर लेना, जिसे चाह कर भी नहीं निकाल पाते. इन बीमारियों में मानव अपनी उदासी या ओबसेशन की भावनाओं से उबर नहीं पाता लेकिन उसमें अन्य सब बातें समझने बूझने की शक्ति होती है. इन रोगों को न्यूरोसिस कहते हैं.

दूसरी तरह के मानसिक रोग वे होते हैं जिसमें मानव में भावनाओं और व्यवहार के साथ साथ, उसकी समझ बूझ में भी फर्क आ जाता है और वे मानव सच या कल्पना में अंतर नहीं समझ पाते. इस तरह के मानसिक रोगों को साईकोसिस कहते हैं जैसे कि स्कित्ज़ोफ्रेनिया की बीमारी.

दोनो तरह के मानसिक रोग इतने हल्के हो सकते हैं कि अन्य सामान्य लोगों को उसके बारे में आसानी से पता न चले, या फ़िर इतने तीव्र हो सकते हैं कि वह मानव कुछ भी काम नहीं कर सके और उसकी बीमारी को आसानी से पहचाना जा सके. बहुत से लोग आम भाषा में अक्सर इन रोगियों को पागल कहते हैं और मानसिक स्वास्थ्य अस्पतालों को पागलखाना कहते हैं. इस तरह के शब्दों के प्रयोग से इन बीमारियों के बारे में समाज में गलत छवि बनती है और उन रोगियों तथा उनके परिवारों पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

मानसिक या दिमागी विकलाँगता वे होती हैं जिसमें दिमाग की नसों में कुछ इस तरह का हो जाता है जिससे उस मानव के सोचने समझने, पढ़ने, लिखने, याद करने, गिनती करने, आदि में कठिनायी हो सकती है. इन विकलाँगताओं को "पढ़ने-सीखने की विकलाँगताएँ" (learning disabilities) भी कहते हैं. बच्चों तथा नवयुवकों में अक्सर यह विकलाँगताएँ जन्म से ही होती है या कई बार दिमाग में फैलने वाले इन्फेक्शन से हो सकती है. यह विकलाँगताएँ उम्र के साथ वृद्ध लोगों में भी हो सकती हैं.

दिमागी विकलाँगताएँ भी भिन्न भिन्न तरह की होती हैं, जैसे कि डाउन सिन्ड्रोम, आउटिस्टिक, डिस्लेक्सिया, अल्ज़हाइमर, इत्यादि.

मानसिक रूप से विकलाँग व्यक्तियों को बहुत से लोग आम भाषा में "रिटार्डिड" (कमज़ोर दिमाग वाला) कहते हैं. इनका साधारणतय इलाज नहीं हो सकता और कुछ व्यक्तियों में, दिमागी विकलाँगता के साथ साथ, कुछ शारीरिक विकलाँगताएँ भी हो सकती हैं.

चाहे मानसिक रोग हो या दिमागी विकलाँगता, इन सबके साथ सबसे बड़ी कठिनाई है इनके बारे में समाज में प्रचलित गलतफहमियाँ और लोगों द्वारा इनसे पीड़ित बच्चों और बड़ों का तिरस्कार और मज़ाक उड़ाना. समाज अक्सर यह नहीं देखता कि लोगों को कैसे प्रोत्साहन दिया जाये ताकि वह अपने अन्दर छुपी खूबियों और काबलियत को बढ़ा कर उनका उपयोग कर सकें, बल्कि कोशिश होती है कैसे उनको गाली दें, उन्हें दबायें, उन्हें यह दिखायें कि वह कुछ नहीं कर सकते.

मानसिक रोग तथा मानसिक विकलाँगताएँ, दोनो ही विषय हिन्दी सिनेमा में कई बार उठाये गये हैं. आईये इसके कुछ उदाहरणों की बात करें.

हिन्दी फ़िल्मों में मानसिक रोग

हिन्दी फ़िल्मों में कई बार मानसिक रोगों की बात उठायी गयी है. यह बात अधिकतर दो तरह दिखायी जाती है. एक ओर नायक या नायिका का असफ़ल प्रेम की वजह से मानसिक संतुलन खो देना दिखाया जाता है, दूसरी ओर मनोरोग अस्पताल में रहने वाले लोगों को और वहाँ काम करने लोगों को, हँसी मज़ाक का पात्र दिखाया जाता है.

इस दृष्टिकोण से बनी फ़िल्मों का एक उदाहरण है 1969 की असित सेन द्वारा निर्देशित फ़िल्म "खामोशी" जिसमें एक ओर राजेश खन्ना और धर्मेन्द्र के पात्र थे जो प्रेम में असफल होने से मानसिक रोग के शिकार दिखाये गये थे. दूसरी ओर थीं मानसिक रोग के अस्पताल में काम करने वाली नर्स राधा के रूप में वहीदा रहमान जो उनका इलाज करने के लिए, उनसे प्रेम का नाटक करती हैं. राधा मरीज़ो से प्रेम का नाटक करते करते, सचमुच प्रेम करने लगती है और उनके ठीक हो कर अस्पताल से जाने पर स्वयं मानसिक रोगी बन जाती है. इस फ़िल्म में जहाँ हीरो हीरोईन के मानसिक रोग को भावात्मक तरीके से दिखाया गया था, वहीं मानसिक रोग के अस्पाल में भर्ती अन्य मरीज़ों को, विदूषक की तरह हँसी मज़ाक का पात्र बना कर भी दिखाया गया था.

असफल प्रेम से होने वाले मानसिक रोग का इलाज करने के लिए किसी का प्रेम चाहिये, इस तरह से सोच वाली फिल्मों के कुछ अन्य उदाहरण हैं "खिलौना" (1970) और "क्यों कि" (2005).

"खिलौना" में असफल प्रेम से पागल हुए संजीव कुमार को ठीक कराने के लिए नाचने वाली चाँद यानि मुम्ताज़ को उनसे प्रेम का नाटक करने लिए घर लाया जाता हैं. प्रियदर्शन की फ़िल्म "क्यों कि" में प्रेमिका की मृत्यू पर दुख से पागल सलमान खान को एक डाक्टर (करीना कपूर) का प्यार ठीक होने में सहारा देता है.

प्रेम में असफल होने के अतिरिक्त, कई फ़िल्मों में गहरे सदमे या चोट पहुँचने से भी मानसिक रोग का होना दर्शाया गया है. जैसे कि "घर" (1978) तथा "15 पार्क एवेन्यू" (2005), जिनमें बलात्कार की वजह से मानसिक रोग का होना दर्शाया गया था.

"घर" में  कहानी थी नववधु आरती (रेखा) की जिन्हें बलात्कार के बाद डिप्रेशन हो जाता है और वह अपने नवविवाहित पति (विनोद मेहरा) से भी डरती है. इस फिल्म में दिखाया गया था कि अगर सुहानूभूति और सहारा मिले तो मानसिक रोग से बाहर निकलना सम्भव है.

अपर्णा सेन की राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली फ़िल्म "15 पार्क एवेन्यू" का मुख्य विषय था मानसिक रोग और उसका परिवार के अन्य लोगों पर पड़ने वाला प्रभाव. मिताली यानि कोन्कणा सेन को स्कित्ज़ोफ्रेनिया है, जो ब्लात्कार की वजह से उभर जाता है. वह अपनी बड़ी बहन अनु (शबाना आज़मी) और माँ (वहीदा रहमान) के साथ रहती है. छोटी बेटी का मानसिक रोग, परिवार का अकेलापन और सबसे दूर होना, समाज में मानसिक रोगियों के प्रति गलत विचार, इस फ़िल्म में इन सब बातों को बहुत प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया था.

स्कित्ज़ोफ्रेनिया की बीमारी को कई बार एक शरीर में दो विभिन्न व्यक्तित्वों के साथ रहने के रूप में, यानि "मल्टिपल पर्सनेलिटी" की बीमारी के रूप में भी दिखाया गया है, जैसे कि "रात और दिन" (1967). इस फ़िल्म में दिन में गृहणी बन कर रहने वाली वरुणा (नरगिस) और रात को शराब-बार में गाने और नाचने वाली पेगी की कहानी थी. इस फ़िल्म में मानसिक रोग को बचपन में घर के घुटे वातावरण में बड़े होने की वजह से, अपने मन में छुपी इच्छाओं को न व्यक्त कर पाने का नतीजा दिखाया गया था.

2004 की फ़िल्म "मदहोशी" में नायिका अनुपमा (बिपाशा बसु) एक सदमें की वजह से एक कल्पनिक दुनिया में खो जाती है और एक काल्पनिक पुरुष से प्रेम करने लगती है. 1984 की अपर्णा सेन की एक अन्य फ़िल्म "परोमा" में एक गृहणी (राखी) का विवाह के बाहर एक अन्य पुरुष से प्रेम करने और बाद में परिवार से ठुकराये जाने पर मानसिक संतुलन खो देना दिखाया गया था.

बार बार एक ही बात को सोचना या किसी एक विचार को न भूल पाने को ओबसेशन कहते हैं. इस मानसिक रोग को विभिन्न फ़िल्मों में दिखाया गया है. जैसे कि 1962 की गुरुदत्त की फिल्म "साहब, बीबी और ग़ुलाम" में, जिसमें हवेली की बड़ी बहू को दिन भर बार बार हाथ धोते हुए दिखाया गया था. इसी तरह की कुछ बीमारी 1993 की फ़िल्म "डर" में शाहरुख खान को थी जो कि किरण (जुही चावला) नाम की युवती से ओबसेस्ड हो जाते हैं.

"साहब, बीबी और ग़ुलाम" में एक अन्य मानसिक रोग का चित्रण था - शराब के नशे से न निकल पाना. मानसिक रोग विशेषज्ञों के अनुसार शराब या अन्य पदार्थों का नशा करना भी एक तरह का मानसिक रोग है. गुरुदत्त की इस फ़िल्म में अभिनेत्री मीना कुमारी ने छोटी बहू का पति को रिझाने के लिए शराब पीने और फ़िर उसी लत की दलदल में फँस जाने का प्रभावशाली चित्रण किया था. अभिनेता केष्टो मुखर्जी तो मानो शराबी के मानसिक रोग के प्रतीक ही बन गये थे, हर फ़िल्म में उन्हें इसी रूप में दिखाया जाता था.

मानसिक संतुलन खो कर खूनी बन जाना जिसमें मल्टिपल पर्सनेलिटी तथा ओबसेशन  की बीमारियाँ दोनो ही होती हैं, भी कई फ़िल्मों में दिखाया गया है. जैसे कि 2011 की फ़िल्म "मर्डर 2" जिसमें एक युवक औरतों के कपड़े पहन कर शरीर बेचने वाली युवतियों को मारता है.

हिन्दी फ़िल्मों में दिमागी विकलाँगता

शारीरिक विकलाँगताओं पर शुरु से ही बहुत सी हिन्दी फ़िल्में बनी हैं जैसे कि "जागृति" (सत्येन बोस, 1954), "दोस्ती" (सत्येन बोस, 1964), "आरज़ू" (रामानन्द सागर, 1965), इत्यादि. लेकिन मानसिक विकलाँगताओं पर फ़िल्में पिछले दशक में ही बननी शुरु हुई हैं.

राकेश रोशन की 2003 की फ़िल्म "कोई मिल गया" के रोहित (हृतिक रोशन) को दिमागी विकलाँगता दिखायी गयी थी. दिमाग से कमज़ोर रोहित को शिक्षक अपनी कक्षा और विद्यालय में नहीं लेना चाहते, अन्य बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते हैं. मानसिक विकलाँगताओं वाले बच्चों की समस्या का हल इस फ़िल्म में जादुई था, क्योंकि रोहित की विकलाँगता अंतरिक्ष से आये जादू की वजह से मिट जाती है.

संजय लीला भँसाली की 2005 की फ़िल्म "ब्लैक" में कहानी थी एक अन्धी और बहरी लड़की की और उसे पढ़ाने वाले शिक्षक (अमिताभ बच्चन) की जिन्हें बुढ़ापे के साथ अल्ज़हाईमर की बीमारी की वजह से यादाश्त खो बैठने की मानसिक विकलाँगता हो जाती है. इसी से मिलती जुलती बात थी 2005 की फ़िल्म "मैंने गाँधी को नहीं मारा" के प्रोफेसर (अनुपम खेर) को जो अपनी यादाश्त खो बैठते हैं. 2008 की अजय देवग्न की फ़िल्म "यू, मी और हम" में यही भूलने वाली बीमारी फ़िल्म की नायिका पिया (काजल) को होती है.

फ़िल्मों में यादाश्त खो बैठने की बीमारी को अधिकतर नाटकीय तरीके से दिखाया जाता है, जैसे कि हाल में ही आयी "जब तक है जान" में शाहरुख खान को होता है. इस फ़िल्म में इस बीमारी को लंदन की डाक्टर (सारिका), "रेट्रोग्रेड एमनीज़िया" यानि बीती यादों को भूल जाने का नाम देती है. यह केवल कुछ बीते दिनों की बात भूलने वाली बीमारी, उम्र के साथ होने वाली बीमारियों जैसे कि अल्ज़हाईमर, से भिन्न है, जिसमें केवल कुछ बीती बातें ही नहीं, बल्कि व्यक्ति प्रतिदिन जो घटता रहता है उसे भी याद नहीं रख पाते.

2007 की फ़िल्म "तारे ज़मीन पर" में बात थी एक अन्य मानसिक विकलाँगता की जिसे डिसलेक्सिया यानि शब्दों को ठीक से न समझ पाने की विकलाँगता. जिन बच्चों को यह तकलीफ़ होती है वह वर्णमाला के अक्षरों को आसानी से नहीं समझ पाते. इस फ़िल्म में यह भी दिखाया गया था कि विकलाँगता केवल बच्चे या मानव में नहीं होती बल्कि परिवार तथा समाज में भी होती है, क्योंकि वे सहारा देने के बजाय, मानव के आसपास रुकावटें बनाते हैं. जबकि अगर सही मौका मिले तो डिसलेक्सिया वाले बच्चे सब कुछ करने में समर्थ होते हैं.

करन जौहर की 2010 की फ़िल्म "माई नेम इज़ ख़ान" में हीरो शाहरुख खान को एस्बर्गर सिंड्रोम से पीड़ित दिखाया गया था. यह एक अन्य तरह की मानसिक विकलाँगता है जिसमें व्यक्ति शब्दों के प्रतीकात्मक अर्थ नहीं समझ पाता, बल्कि केवल शाब्दिक अर्थ समझता है. साथ ही वह अन्य लोगों से शारीरिक नज़दीकी नहीं चाहता, वह किसी को छूना नहीं चाहता. इस तरह की मानसिक विकलाँगताओं को आउटिस्म के नाम से जाना जाता है, जिसमें लोग अपनी आँतरिक दुनिया में रहना अधिक पसंद करते हैं. अनुराग बसु की 2012 की फ़िल्म "बर्फी" में प्रियँका चोपड़ा को भी आउटिस्टिक विकलाँग व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है.

मानसिक रोग, मानसिक विकलाँगताएँ और समाज

हिन्दी फ़िल्मों ने मानसिक रोगों और मानसिक विकलाँगताओं की बात उठायी है, यह बहुत अच्छी बात है. अक्सर समाज में यह बातें छुपी रहती हैं. जिनके परिवार में किसी को मानसिक रोग हो या मानसिक विकलाँगता हो, वे अधिकतर इसे पारिवारिक शर्म के रूप में जीते हैं. इस शर्म की वजह से परिवार मानसिक रोगियों का ठीक से इलाज नहीं करवाते. लोग सोचते हैं कि यह बात सबके सामने आ जायेगी तो हमारे घर में कोई विवाह नहीं करना चाहेगा, कोई मित्रता नहीं बनाना चाहेगा.

पर मानसिक रोग और विकलाँगताएँ दोनो ही आधुनिक समाज में बढ़ रहे हैं. सड़क पर यातायात के बढ़ने से जुड़ी दुर्घटनाएँ, काम के तनाव, बड़े शहरों का अकेलापन, लम्बे होते जीवन जिनमें लोगों को वृद्धावस्था में सही सहारा नहीं मिलता, इन सब बातों से मानसिक रोग और मानसिक विकलाँगताएँ बढ़ रही हैं.

दूसरी ओर चिकित्सा विज्ञान, शिक्षा और तकनीकी ने भी बहुत तरक्की की है, जिनसे पूरी तरह से जीवन जी पाना, पढ़ना,लिखना, नौकरी करना, सही सहारा मिले तो सब कुछ सम्भव हो गया है. ऐसे में अगर हिन्दी फ़िल्में इन विषयों को पर्दों से बाहर ला कर उनके बारे में जन सामान्य की जानकारी बढ़ा सकती हैं तो यह अच्छी बात है.

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बुधवार, नवंबर 07, 2012

फिल्मी जीवन

कुछ दिन पहले इंटरनेट पर अँग्रेज़ी के अखबार हिन्दुस्तान टाईमस् पर सुप्रतीक चक्रवर्ती की लिखी नयी फ़िल्म "अजब ग़ज़ब लव"  की आलोचना पढ़ रहा था तो एक वाक्य पढ़ते पढ़ते रुक गया. उन्होंने लिखा था "अब तो बोलीवुड का समझ लेना चाहिये कि सचमुच के जीवन में शेव किये हुए बिना दाढ़ी वाले पर सिर पगड़ी पहनने वाले सिख नहीं होते". मन में आया कि अगर सचमुच के जीवन में इस तरह के सिख नहीं होते तो इन फ़िल्मों को देख कर होने लगेंगे.

यानि कभी कभी मुझे लगता है कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सचमुच के जीवन में कुछ होता है या नहीं, अगर फ़िल्मों में दिखने लगेगा, तो धीरे धीरे सचमुच के जीवन में भी होने लगता है. वैसे तो पिछले कई वर्षों में पत्रिकाओं में पढ़ा था कि पंजाब में बहुत से सिख नवयुवक सिर के बाल और दाढ़ी कटा रहे हैं. यह भी पढ़ा था कि कुछ सिख संस्थाओं ने सिर पर पगड़ी कैसे बाँधते हैं इसकी कक्षाएँ चलानी शुरु की हैं, क्योंकि बहुत से नवयुवक पगड़ी बाँधना ही नहीं जानते. इसके साथ यह भी सच है कि सिख धर्मियों में भी विभिन्न गुट हैं और उनमें से कुछ गुट जैसे कि नानकपंथी गुट, बाल और दाढ़ी नहीं बढ़ाते. इस सब की वजह से मुझे लगता है कि आम जीवन में बिना दाढ़ी वाले, लेकिन किसी विषेश अवसर पर पगड़ी पहनने वाले सिख भी हो सकते हैं. इसके बारे में पंजाब में रहने वाले लोग बता सकते हें कि यह होता है या नहीं?

इस बात पर सोचते हुए मन में फिल्मों के जीवन पर होने वाले प्रभाव की बात आयी. आज की स्थिति के बारे में उतना नहीं जानता, हाँ जब मैं किशोर हो रहा था उस समय की याद है.

जब 1960 में "लव इन शिमला" में साधना माथे पर सीधे कटे हुए बालों के साथ आयी थी तो सचमुच के जीवन पर उसका तुरंत प्रभाव पड़ा था, साधना कट बालों की ऐसी धूम चली थी कि छोटी बड़ी हर उम्र की लड़कियाँ उसी अन्दाज़ में बाल बनाती थीं. आज पचास साल बाद भी मेरी उम्र के लोग उस अन्दाज़ को साधना कट के नाम से ही जानते हैं.

कुछ वर्षों के बाद जब राजेश खन्ना, "बहारों के सपने" और "आनन्द" जैसी फ़िल्मों में नीचे जीन्स और ऊपर कुर्ता पहन कर आये तो हम सब नवयुवकों को नयी पोशाक मिल गयी और आज भी जब भी जीन्स पर कुर्ता पहनूँ तो कभी कभी अपने लड़कपन के राजेश खन्ना के प्रति दीवानेपन की याद आ जाती है. राजेश खन्ना ने ही "कटी पतंग" फ़िल्म में "थेंक्यू" के उत्तर में "मेन्शन नाट" कहा था तो आधे भारत को मुस्करा कर कुछ कहने वाले अंग्रेज़ी शब्द मिल गये थे. अमिताभ बच्चन जैसे बाल और जया भादुड़ी जैसे ब्लाउज़ भी अपने समय में बहुत छाये थे.

1975 में "जय सँतोषी माँ" फ़िल्म आयी तो अचानक कई जगह संतोषी माँ के मन्दिर बनने और दिखने लगे और एक ऐसी देवी जिसका नाम नहीं जानते थे, अचानक प्रसिद्ध हो गयी थी.

अगर विवाह के रीति रिवाज़ों के बारे में सोचे, या फ़िर करवाचौथ जैसे पाराम्परिक त्योहारों के बारे में, तो मेरे विचार में पिछले दो दशकों में सूरज बड़जात्या, करन जौहर और यश चोपड़ा जैसे फिल्म निर्देशकों की फ़िल्मों ने उत्तरी भारत के मध्यम वर्ग पर बहुत प्रभाव डाला है. मेहँदी और संगीत के रीति रिवाज़ों को जिस तरह से इनकी फ़िल्मों से मान्यता और बढ़ावा मिला उसका प्रभाव छोटे बड़े शहरों में दिखता है. विवाह के समय पर दुल्हन स्वयं नाचे, यह भी फ़िल्मों का ही प्रभाव लगता है.

Filmi lives graphic


कुछ अन्य प्रभाव पड़ा है कि बढ़ते बाज़ारवाद, मोबाईल टेलीफ़ोन और फेसबुक या गूगल प्लस जैसे सोशल नेटवर्कों से. बाज़ारवाद का प्रभाव है कि बेचने के लिए कोई न कोई बहाना होना चाहिये. वह भी अगर अंग्रेज़ी में कहा जा सके तो उसका प्रभाव और भी बढ़िया होगा. यानि "वेलेन्टाईन डे" हो या "मदर्स डे" या "फादर्स डे" या "फ्रैंडशिप डे", बेचने के कार्यक्रम शुरु हो जाते हैं. फ़िल्मों में इनके लिए कोई गाने या दृश्य बन जाते हैं. मोबाईल से एसएमएस भेजिये या फेसबुक, गूगल प्लस से सबको ग्रीटिँग भेजिये, बस आप बिना मेहनत के आधुनिक हो गये.

इन सब बातों को सोच कर ही बेचने वाली कम्पनियाँ फ़िल्मों में पैसा लगाती हैं ताकि हीरो उनके पेय की बोतल पीता दिखाया जाये, या हीरोइन उनकी कम्पनी के स्कूटर को चलाये या उनकी टूथपेस्ट से दाँत ब्रश करें. इतना पैसा लगाने वाली कम्पनियाँ जानती हैं कि इन दृश्यों का प्रभाव देखने वालों पर पड़ेगा और उनकी बिक्री बढ़ेगी.

यह प्रभाव केवल भारत में ही पड़ा हो यह बात नहीं. चीन में विवाह के समय पर लोगों को अधिकतर पश्चिमी तरीके की विवाह की पौशाक पहने देखा है, यानि वधु को सफ़ेद रंग का पश्चिमी गाउन पहनाते हैं, जबकि उनकी पाराम्परिक पौशाक लाल रंग की होती थी. चीन में बहुत से लोगों को अपने चीनी नामों के साथ साथ, पश्चिमी नामों के साथ भी देखा है जोकि इसलिए रखे जाते हैं ताकि विदेशी लोगों को उन्हें बुलाने में आसानी हो. इसमें से कितना प्रभाव विदेशी फ़िल्मों की वजह से है, यह नहीं कह सकता.

मुझे लगता है कि इस विषय पर मेरी जानकारी कुछ पुरानी हो गयी है. आजकल भारत के विभिन्न प्रदेशों में फ़िल्मों का सामान्य जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है, आप इसके बारे में क्या सोचते हैं और क्या इसके कुछ उदाहरण दे सकते हैं?

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शुक्रवार, अक्तूबर 12, 2012

बालों का रंग


करीब तीस-बत्तीस साल के बाद मिल रहे थे. इस बीच में हमारे बीच कोई भी सम्पर्क नहीं रहा था.

साथ साथ मेडिकल कालेज में पढ़े थे पर मेडिकल कालेज के दिनों में हमारे बीच कोई विषेश दोस्ती नहीं थी. हमारी विषेश दोस्ती बनी थी पढ़ायी के समाप्त होने पर जिस समय नये स्नातक डाक्टरों को, एक साल के लिए अस्पताल में काम करके चिकित्सा विज्ञान का प्रेक्टिकल अनुभव प्राप्त करना होता है, जिसे इन्टर्नशिप कहते हैं. उस दौरान हम दोनो की कई पोस्टिंग साथ साथ हुईं थीं. इन्टर्नशिप के दौरान नये डाक्टरों से खूब दिन रात काम लिया जाता है, साँस लेने कि फुरसत मुश्किल से मिलती थी. उन दिनों में जब भी कुछ समय मिलता, अक्सर हम दोनो दिल्ली में कश्मीरी गेट से आगे जा कर यमुना तट पर बने तिब्बती रेस्टोरेंट में खाना खाने जाते और घँटों बातें करते.

वह इन्टर्नशिप का वर्ष समाप्त हुआ, डिग्री मिली और हम दोनों के रास्ते अलग दिशाओं में मुड़ गये. सुना कि उसका विवाह अमरीका में कहीं हुआ है. फ़िर सुना कि जहाँ विवाह हुआ था वहाँ कुछ झँझट थे, पर कुछ अधिक नहीं पता चला. बस उसके बाद कोई अन्य बात नहीं सुनी, न ही मालूम हुआ कि वह कहाँ है, क्या करता है?

अब कुछ समय पहले फेसबुक और मेडिकल कोलिज में साथ में हमारे साथ पढ़ने वाले लोगों की वजह से उससे फ़िर से सम्पर्क हुआ. मालूम चला कि वह इँग्लैंड में रहता है. उसके शहर में जाने का मौका मिला तो उससे मुलाकात भी हुई. एक पब में मिले और बीयर पीते पीते पुरानी बातों की बात हुई.

वह छरहरा सा लड़का जो मेरी यादों में था, अब अच्छे खासे खाते पीते घर के तँदरुस्त व्यक्ति में बदल गया था, जिसे अगर सड़क पर मिलता तो पहचान ही नहीं पाता. जब बीते दिनों की बातें चुक गयीं तो कुछ समझ नहीं आया कि क्या बात करें. इतने सालों में हमारे जीवनों में जो कुछ हुआ था, उससे हमारे बीच की बातें कुछ कम हो गयी थीं.

अचानक वह बोला,"तू तो बिल्कुल अँकल टाइप लगता है इन सफेद बालों में. बालों को डाई क्यों नहीं करता?"

उसके बाल घने और गहरे काले थे. मुझे हँसी आ गयी, मैं बोला, "बेटा, तू चाहे तो तू भी मुझे अँकल बुला ले, मैं बुरा नहीं मानूँगा."

वह पहला व्यक्ति नहीं था जिसने बाल रँगने करने के लिए मुझे कहा था. पहले भी कुछ लोगों से यही बात सुन चुका था.

यह सच है कि मैंने कई बार सोचा है कि अपने बालों का एक लच्छा जामुनी या हरे रंग में रंगवा लूँ, लेकिन उनको काला करके अधिक जवान दिखने की मेरी कभी कोई इच्छा नहीं हुई. एक बार मँगोलिया में यात्रा के दौरान एक लड़का मिला था जिसने अपने बाल हलके भूरे रंग में रँगवाये थे, जो मुझे बहुत अच्छा लगा था और मन में आया था कि अपने बाल वैसे ही भूरे रँगवा लूँ.

अपने बालों को जो काला नहीं रंगवाना चाहता, इसके पीछे बात है मेरे पिता के परिवार के इतिहास की.

मेरे दादा द्वारका प्रसाद छोटे से थे जब उनके पिता का देहाँत हुआ था. वह अपने बड़े भाई बेनी प्रसाद की छत्रछाया में बड़े हुए. द्वारका प्रसाद 33 वर्ष के थे, जब उनका देहाँत हुआ था. उस समय मेरे पिता ओम प्रकाश तीन साल के थे. मैं स्वयं बीस साल का था जब मेरे पिता का देहाँत हुआ था.

बचपन से ही मेरे मन में यह बात घर कर गयी थी कि हमारे परिवार में पिताओं को अपने बच्चों को ठीक से बड़ा होते देखना नसीब नहीं होता. बहुत सालों तक मेरे अपने मन में भी डर था कि अपने बेटे को ठीक से बड़ा होते देखने का मुझे भी मौका नहीं मिलेगा. पर ऐसा नहीं हुआ. मुझे अपने बेटे का बड़ा होना, उसका नौकरी करना, उसका विवाह, सब कुछ देखने को मिला.

इसलिए मुझे लगता है कि बहुत किस्मत से इतनी पुश्तों के बाद हमारे परिवार में मेरे बेटे को सफेद बालों वाला पिता मिला है. जब हम दोनों शाम को कभी बाग में बाते करते हुए घूम रहे होते हैं तो कभी कभी सोचता हूँ कि मेरे पिता, दादा, परदादा, सभी हम दोनो के साथ साथ ही घूम रहे हैं, हमारी बातें सुन रहे हैं और खुश हो रहे हैं.

आप ही कहिये, इतनी किस्मत से मिले सफ़ेद बाल, इनको कैसे रँगा जा सकता है?

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हमारी कुछ पुरानी तस्वीरें:

Sunil & Marco Tushar

Sunil, Nadia & Marco Tushar

Sunil & Marco Tushar

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रविवार, अक्तूबर 07, 2012

शरीर की प्यास


रानी मुखर्जी की नयी फ़िल्म "अईय्या" का एक गाना देखा तो एक पुरानी बात याद आ गयी.

करीब 35 वर्ष पहले की बात है, मेरे क्लिनिक में एक महिला आयीं. पचास या बावन की उम्र थी उनकी. उनकी समस्या थी कि उनके पति में आध्यात्म योग का वैराग्य जागा था. वह अपने शरीर पर और इच्छाओं पर संयम रखना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नि से शारीरिक सम्बन्ध न रखने का फैसला किया था. उन महिला का कहना था कि वह इस बात से बहुत दुखी थीं और पति का समीप न होना उन्हें बहुत कष्ट देता था. वह बोली, "मेरे शरीर की भी तो प्यास है, मुझे अपने पति से सम्बन्ध चाहिये, उनका सामिप्य चाहिये, मैं क्या करूँ?"

उन महिला के पति मुझे बहुत मानते थे इसलिए वह चाहती थीं कि मैं उनके पति से कहूँ कि वह इस तरह से पत्नी से सब सम्बन्ध न तोड़ें. मैंने उस समय तो उनसे कहा कि हाँ मैं आप के पति से इस विषय में बात करूँगा. लेकिन मन ही मन में कुछ हड़बड़ा गया था.

रात को मैंने अपनी पत्नि से इसके बारे में सलाह माँगी. मेरी पत्नि का कहना था कि नारी जब पति का सामिप्य चाहती है तो बात केवल शारीरिक सम्बन्धों की नहीं है, बल्कि नारी के लिए वह तो इसका केवल एक हिस्सा है. नारी के सामिप्य की चाह में एक अन्य भाग होता है मानसिक सामिप्य का, एक दूसरे को छूने का, यह जताने का और कहने का कि तुम मेरे लिए प्रिय हो. इसलिए मेरी पत्नी के अनुसार मुझे उन महाशय से कहना चाहिये था कि अगर वे अपने आध्यात्मिक व्रत के कारण अपनी पत्नि से शारीरिक सम्बन्ध न भी रखना चाहें, तो कम से कम मानसिक रूप से उन्हें अपनी पत्नि के करीब होना चाहिये. मेरी पत्नी ने यह भी कहा कि पति पत्नि के रिश्ते के बारे में इस तरह का एकतरफ़ा निर्णय लेना ठीक नहीं, जो भी बात हो दोनो को मिल कर निर्धारित करनी चाहिये, नहीं तो पत्नि विवाह के बाहर भी उस कमी को भर सकती है.

अगर हमारे समाज में सेक्स और आँतरिकता के बारे में बात करना बहुत कठिन है तो यह बात हमारे मेडिकल कालिजों पर भी उतनी ही लागू होती है. जब मेरे मेडिकल कालिज में एनाटमी यानि शरीर विज्ञान की पढ़ायी के दौरान नर और नारी गुप्त अँगों की बारी आयी तो हमारे प्रोफेसर साहब ने मुस्करा कर टाल दिया. कक्षा में बोले कि यह हिस्सा अपने आप पढ़ लेना. न ही फिज़ीयोलोजी में सामान्य सेक्स सम्बन्ध क्या होते हैं के बारे में कुछ पढ़ाया या बताया गया. जब कुछ सालों के बाद बीमारियों के बारे में पढ़ाया गया तो गोनोरिया या सिफलिस जैसे गुप्त अंगो के रोगों का इलाज किन दवाओं से किया जाना चाहिये, यह तो पढ़ाया गया लेकिन नर नारी के बीच सेक्स सम्बन्ध में क्या कठिनाईयाँ हो सकती हैं और उनका इलाज कैसे किया जाये, इसकी कभी कोई बात नहीं हुई. फैमिली प्लेनिँग यानि परिवार नियोजन क्या होता है यह अवश्य कुछ पढ़ाया गया लेकिन हस्त मैथुन के क्या प्रभाव होते हैं, या कण्डोम का सही प्रयोग कैसे करना चाहिये जैसी बातों के बारे में कुछ नहीं बताया गया था.

कहने का अर्थ यह है कि मेडिकल कालेज से मेरी तरह के निकले आम डाक्टरों को यह सब कुछ पता नहीं होता कि सेक्स क्या होता है और पति पत्नि की सेक्स इच्छाओं में क्या भेद होते हैं, उन्हें किस तरह की सलाह देनी चाहिये! बस उतना ही मालूम होता है, जो अन्य लोगों को होता हैं, या जितना किसी किताब या पत्रिका में लिखा मिल जाये, वह भी तब जब वह इस विषय पर स्वयं कुछ खोज करें. यह तो आज को नवयुवक डाक्टर ही बता सकते हैं कि क्या इस विषय में आज के हमारे मेडिकल कालेज बदले हैं या नहीं? आज सेक्स के बारे में इंटरनेट पर इतना कुछ भरा है कि सारा जीवन देखते पढ़ते रह सकते हैं, लेकिन यह सब सेक्स को खरीदने बेचने के कारोबार जैसा है, इससे लोगों को सेक्स के बारे में क्या सही सलाह दी जाये, यह समझना उतना आसान नहीं.

हमारे समाज में आम सोच भी है कि लड़कों और पुरुषों को सेक्स की भूख होती है, जबकि लड़कियाँ और नारियाँ इसे केवल सहती हैं. यानि इस सोच में नारी की यौनिकता को नकार दिया जाता है या पुरुष यौनिकता से कमज़ोर माना जाता है. यह सोच भी है कि विवाह के बाहर सेक्स से लड़की की इज़्ज़त लुट जाती है या, कोमार्य उनका सर्वोच्च धन है जिसे उन्हें सम्भाल के रखना चाहिये. पुरुषों को इस तरह की सलाह नहीं दी जाती, बल्कि उनके लिए सलाह होती हैं कि अगर किसी से सम्बन्ध करने हैं तो कण्डोम का प्रयोग करो जिससे अनचाहे बच्चे या गुप्त रोग न हों.

इसी तरह के विचारों की बुनियाद पर ही भारत, पाकिस्तान, बँगलादेश जैसे देशों के पाराम्परिक समाज में लोग, "नारी को अकेले घर से बाहर नहीं निकलना चाहिये", "लज्जा करनी चाहिये", "घूँघट करना चाहिये", "बुर्का पहनना चाहिये", जैसी बातें करते है. इन्हीं विचारों की बुनियाद पर ही मध्य पूर्व तथा अफ्रीका के कुछ देशों में बच्चियों तथा नवयुवतियों के गुप्त अँगों को बचपन में काटा जाता है और कभी कभी सिला भी जाता है, ताकि उनकी यौनिकता को मुक्त पनपने का मौका न मिले. इसी तरह की कुछ बात कैथोलिक धर्म में होती है जब सेक्स को केवल प्रजनन का माध्यम माना जाता है और केवल प्रेम के लिए या वैवाहिक आनन्द के लिए सेक्स को, और परिवार नियोजन के उपायों के प्रयोग को, जीवन के विरुद्ध मान कर अस्वीकार किया जाता है.

लेकिन आर्थिक विकास के साथ पिछले दशकों में एक अन्य बदलाव आया है. आधुनिक लड़कियाँ और युवतियाँ जानती हैं कि कैसे परिवार नियोजन के उपायों के सहारे गर्भ को रोका जा सकता है और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर युवतियों को समाज की स्वीकृति की उतनी परवाह नहीं. इससे नारी यौनिकता को अभिव्यक्ति का मौका पुरुषों के बराबर मिलता है.

बम्बईया फ़िल्मों में भी स्त्री पुरुष सम्बन्धों को अधिकतर पुरुष की दृष्टि से तरह से दिखाया जाता रहा है जिसमें पुरुष यौन सम्बन्ध चाहता है और "रूप तेरा मस्ताना" गा कर अपनी इच्छा को स्पष्ट कहता है जबकि नारी शरमाती हिचकिचाती है. लेकिन बदलते समाज के साथ नारी यौनिकता को भी मुम्बई फ़िल्मों में कुछ स्वीकृति मिलने लगी है.

मेरे विचार में भारत की आधुनिक अभिनेत्रियों में रानी मुखर्जी ने नारी यौनिकता को सबसे मुखर तरीके से व्यक्त किया है. हाल में ही आयी "द डर्टी पिक्चर" और "इश्किया" फ़िल्मों में विद्या बालन ने भी नारी यौनिकता को मुँहफट तरीके से व्यक्त किया था, लेकिन वह अभिव्यक्ति सामान्य जीवन के बाहर के नारी चरित्रों से जुड़ी थी. प्रियँका चोपड़ा ने भी अपनी फ़िल्म "एतराज़" में नारी यौन प्यास को अभिव्यक्त किया लेकिन उसमें उनका चरित्र पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित था. दूसरी ओर रानी मुखर्जी ने "साथिया", "पहेली", "युवा" एवँ "बँटी और बबली" जैसी फ़िल्मों में भारतीय समाज की सामान्य शहरी और गाँवों की नारियों की यौनिकता के विभिन्न रूपों को सुन्दरता से व्यक्त किया है.

Rani Mukherjee - expressing female sexuality

"अईय्या" के गाने में रानी मुखर्जी का पात्र अपने मनभाये पुरुष के पेट पर उभरे सिक्स पैक पर हलके से उँगली फ़िरा कर जताता है कि उसे अपने प्रेमी का शरीर सेक्सी लगता है.

इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत "वाट टू डू" भी नारी पात्र की यौन इच्छा और पुरुष पात्र के हिचकिचाने, घबराने को रोचक तरीके से प्रस्तुत करता है. अक्सर लोग इस तरह के गीत को मज़ाक के रूप में देखते हैं कि सचमुच के जीवन में पुरुष नहीं घबराते हिचकिचाते, बल्कि युवतियाँ हिचकिचाती घबराती हैं. लेकिन मेरे अनुभव में जब कोई स्त्री अपनी यौनिकता को सहजता से स्वीकार कर लेती है और आत्मविश्वास के साथ कहती है कि उसे भी सेक्स और आँतरिकता चाहिये, तो अधिकतर पुरुष घबरा और बौखला जाते हैं, उनका आत्म विश्वास आसानी से चरमरा जाता है.

खुल कर अपने मूल्यों पर अपना जीवन जीने वाली युवती को वही पुरुष स्वीकार कर पाता है जिसमें पूरा आत्मविश्वास हो. जिनमें यह आत्मविश्वास कम हो या न हो, वह पाराम्परिक पति परमेश्वर बने रहना चाहते हैं और पाराम्परिक पत्नी चाहते हैं. उन्हें स्वच्छन्द जीवन जीने वाली युवती में समाज और परिवार का विनाश दिखता है और वह उन युवतियों को चरित्रहीन कहते हैं, उन्हें संस्कृति की याद दिलाते हैं, उन्हें शरीर ढकने, लज्जा करने और शालीनता के सबक देते हैं.

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सोमवार, सितंबर 17, 2012

फ्राक पहनने वाले लड़के


आप का दो या तीन साल का बेटा फ्राक पहनने या नेल पालिश लगाने की ज़िद करे या खेलने के लिए गुड़िया चाहे, तो आप क्या करेंगे? और आप कुछ न भी कहें, आप के मन में क्या विचार आयेंगे? अगर पाँच-छहः साल का होने पर भी आप का बच्चा इसी तरह की ज़िद करता रहे तो आप क्या करेंगे?

अगर आप की उसी उम्र की बेटी इसी तरह से पैंट या निकर पहनने की ज़िद करे, लड़कों के साथ मार धाड़ के खेलों में मस्त रहे तो आप क्या सोचेंगे?

आज के समाज में लड़कियाँ का पैंट या जीन्स पहनना आसानी से स्वीकारा जाने लगा है. शायद ही ऐसा कोई काम बचा हो जिसे केवल लड़कों का काम कहा जाता हो. डाक्टर, वकील से ले कर पुलिस और मिलेट्री तक हर जगह अब लड़कियाँ मिलती हैं. कोई युवती पुलिस में हो या मिलेट्री में, यह भी स्वीकारा जाता है कि उस युवती का विवाह होगा, बच्चें होगें और परिवार होगा, यह आवश्यक नहीं कि उस युवती को लोग समलैंगिक ही माने.

लेकिन शायद लड़कों के लिए समाज के स्थापित लिंग मूल्यों की परिधि से बाहर निकलना, अभी भी आसान नहीं है. पति घर में झाड़ू या सफ़ाई करे, खाना बनाये या बच्चे का ध्यान रखे, तो अक्सर लोग सोचते हैं कि "बेचारे को कैसी पत्नी मिली!" या फ़िर सोचते हैं कि उसमें पुरुषार्थ की कमी है. लड़के फ्राक पहनना चाहें, मेकअप करना चाहें या गुड़िया से खेलना चाहें, तो तुरंत ही माता पिता दोनो बिगड़ जाते हैं. खेल के मैदान में साथ खेलने वाले साथी और विद्यालय में साथ पढ़ने वाले उसका जीवन दूभर कर देते हैं.

कुछ सप्ताह पहले ऐसे लड़कों और उनके माता पिता के बारे में अमरीकी प्रोफेसर रुथ पाडावर का लिखा, न्यू यार्क टाईमस मेगज़ीन पत्रिका में एक आलेख छपा था.

Cover New York Times Magazine

इस आलेख में उन्होंने बताया है कि कुछ दशक पहले तक लड़कों के इस तरह के व्यवहार को बीमारी के रूप में देखा जाता था. डाक्टरों का कहना था कि इस तरह के व्यवहार को तुरंत न रोका गया तो बच्चा बड़ा हो कर समलैंगिक बनेगा, नारी बन कर जीना चाहेगा. इसलिए तब इन लड़को को जबरदस्ती "लड़कों जैसे रहो और बनो" के लिए मजबूर किया जाता था. आज इस बारे में डाक्टरों और मनोवैज्ञानिकों की सोच बदल रही है.

आलेख पढ़ते हुए मुझे अंग्रेजी फ़िल्म "बिल्ली एलियट" (Billy Elliot) याद आ गयी जिसमें खान में काम करने वाले मजदूर पिता के बेटे की कहानी थी जो नृत्य सीखना चाहता है और उसके पिता को यह जान कर बहुत धक्का लगता है.

मेरी एक इतालवी मित्र जो पहले पुरुष थी और जिसने लिंग बदलवा कर नारी बनने का आपरेशन करवाया था, मैंने उसके विषय में एक बार इस ब्लाग पर लिखा था. एक बार उसने मुझे बताया था कि उसके छोटेपन में उसके लिए सबसे अधिक कठिन था अपने परिवार की शर्म को स्वीकार करना, "अगर तुम युवक हो और युवतियों के कपड़े पहनो, युवतियों जैसा व्यवहार करो, तो दुनिया तुम्हारा तिरस्कार करती है. तुम्हारे साथ के मित्र तुम्हारे साथ नहीं दिखना चाहते, सोचते हैं कि तुम्हारे साथ रहने से लोग उनके बारे में भी गलत सोचेंगे. कुछ तथाकथित मित्र इतनी क्रूर बातें करते हैं और कहते हैं कि तुम्हारा दिल टूट जाता है. तुम कोशिश करते हो कि इसको छुपा कर रखो. घर में माता पिता, इसे मान भी लें, वे कहते हैं कि घर के अन्दर जैसा चाहो वैसे रह लो, पर घर से बाहर लड़कों जैसे रहो, नहीं तो लोग हमारा मज़ाक उड़ायेंगे, हमारा जीना दूभर हो जायेगा."

करीब एक दशक पहले मैंने यौन पहचान, व्यक्तित्व और यौनिक इच्छा विषय पर शौध किया था. उस शौध के दौरान, एक युवक ने इससे कुछ कुछ विपरीत समस्या बतायी थी. वह विवाहित था और उसके तीन बच्चे थे. उसने बताया था कि "जब मैं छोटा था तो मुझे गुड़िया से खेलना अच्छा लगता था, लड़कियों के कपड़े पहनना चाहता था. कुछ बड़ा हुआ तो लड़कियों के कपड़े पहनने की इच्छा अपने आप लुप्त हो गयी, लेकिन मेरे शौक लड़कियों जैसे थे. मुझे प्रेम कहानियाँ पढ़ना, घर में खाना बनाना, कढ़ायी बुनायी करना अच्छा लगता था. आज भी मेरे वही शौक हैं. मेरे साथी मित्रों में कुछ अपेक्षा सी हो गयी कि मैं समलैंगिक हूँ. सब यही कहते थे कि मैं ऐसा हूँ तो अवश्य समलैंगिक होऊँगा. मैंने कुछ समलैंगिक सम्बन्ध भी किये, पर कुछ मज़ा नहीं आया, मुझे लड़कों से गहरी दोस्ती पसंद थी लेकिन मुझे लड़कों के साथ सेक्स में वह आनन्द नहीं मिला जो लड़कियों के साथ सेक्स में मिला. मेरे कुछ समलैंगिक मित्र कहते थे कि मैं भीतर से समलैंगिक हूँ लेकिन मैं उसे स्वीकारना नहीं चाहता. मेरे विचार में किसी पर यह ज़ोर नहीं होना चाहिये कि अगर किसी के शौक लड़कियों जैसे हैं तो उसे समलैंगिक ही होना चाहिये."

अपने शौध की वजह से मेरी सोच और समझ में बहुत अन्तर आया था लेकिन यह भी सच है कि मैं अपने भीतर इमानदारी से देखूँ तो जानता हूँ कि मन में गहरे मूल्य आसानी से नहीं बदलते. हाँ इतनी समझ आ गयी है कि मानव की यौन पहचान और यौनता को आसानी से श्रेणियों में बाँटा नहीं जा सकता.

रूथ ने अपने आलेख लिखने के बारे में एक ब्लाग में बताया है कि आज के बहुत से माता पिता जब यह जान जाते हैं कि उनका बेटा लड़कियों जैसे कपड़े पहनना चाहता है या गुड़िया से खेलना चाहता है तो वह उन बच्चों पर कोई ज़बरदस्ती नहीं करना चाहते, वह चाहते हैं कि बच्चा अपनी प्रकृति के अनुसार ही व्यवहार करे और बड़ा हो. पर ऐसा करना आसान नहीं क्योंकि समाज का, साथ के अन्य बच्चों का व्यवहार उनसे कहते है कि उनके बच्चे में कुछ खराबी है. इसलिए इस तरह के कई माता पिता ने इंटरनेट के माध्यम से एक दूसरे को सहारा देने के लिए फोरम बनाये हैं, ब्लाग बनाये हैं.

रुथ का शौध बताता है कि सात से दस प्रतिशत लड़कों में इस तरह की बात किसी हद तक हो सकती है, किसी में कुछ कम, किसी में अधिक.

आजकल डाक्टर तथा मनोवैज्ञानिक भी इसे बीमारी नहीं मानते और कहते हैं कि बच्चो को अपने व्यक्तित्व का विकास जिस दिशा में करना चाहे वैसा करने की छूट होनी चाहिये. इस शौध के अनुसार करीब दस वर्ष के होते होते, यह लड़के इस तरह के कपड़े पहनना या व्यवहार करना बन्द कर देते हैं.

बड़े होने पर, उनमें से करीब साठ प्रतिशत युवक समलैंगिक हो सकते  हैं और करीब चालिस प्रतिशत विषमलैंगिक. लेकिन यह शौध यह भी बताता है कि घर वालों तथा माता पिता का सहारा मिलने पर भी, समाज और स्कूल में इन बच्चों पर उनके हम उम्र बच्चों के दबाव रहता है जो कि मान्य लैंगिक मूल्यों के बाहर वाले बच्चों को नहीं स्वीकारते.

आप रुथ का आलेख न्यू योर्क टाईमस पत्रिका पर पढ़ सकते हैं और आलेख लिखने के बारे में रुथ का साक्षात्कार इस ब्लाग पर  पढ़ सकते हैं.

भारत में अगर इस तरह के बच्चे हों तो उनके माता पिता को सलाह और सहारा देने के कोई माध्यम हैं? अगर आप को इसके बारे में जानकारी हो, तो मुझे अवश्य बताईयेगा.

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बुधवार, अगस्त 29, 2012

ब्राज़ील यात्रा डायरी - खोयी सभ्यता की तलाश (1)


23 अगस्त 2012, गोईयास वेल्यो

दो कक्षाओं के बच्चे अपनी अध्यापिकाओं के साथ आये थे. पहाड़ की ढलान पर ऊपर नीचे जाती सीढ़ियाँ, नीचे चमकता नदी का पानी, अमेरिंडयन जनजाति के गाँव की झोपड़ियाँ, बच्चे यह सब कुछ मंत्रमुग्ध हो कर देख रहे थे.

एक ओर हारोल्दो और गुस्तावियो स्वागत के ढोल बजा रहे थे. दूसरी ओर एक चबूतरे पर रेजीना और शर्ली हाथ में कटोरियाँ ले कर खड़ी थीं जिनमें एक पौधे के बीजों से बनाया गहरा कत्थई रँग था जिससे वे हर बच्चे के गालों पर स्वागत चिन्ह बना रही थीं.

Vila Esperança, Indigenous culture festival, Brazil

दो अध्यापिकाएँ भी उत्साहित सी हो कर बच्चों के साथ अपने गालों पर स्वागत चिन्ह लगवाने लगीं, जबकि दो अन्य अध्यापिकाएँ दूर से ही खड़ी देख रही थीं. उनके चेहरे के भाव से स्पष्ट था कि उन्हें यह सब अच्छा नहीं लग रहा था.

चेहरे पर स्वागत चिन्ह बनवाने के बाद बच्चे एक चकौराकार भवन में गये  जिसकी छत बीच में से खुली थी और जिसके बीच में लकड़ी का खम्बा लगा था. भवन की दीवारों पर अमेरिंडियन मुखौटे लगे थे. एक ओर रोबसन और लुसिया जनजातियों के गीत गा रहे थे. गीतों के बाद रोबसन ने धरती, अम्बर, पवन और अग्नी की पूजा की और फ़िर बच्चों को एक अमेरिंडियन लोककथा सुनायी.

फ़िर बारी आयी नत्यों की. जनजातियों के विभिन्न नृत्य थे, जिन्हें रोबसन पहले सिखाता फ़िर सब बच्चे मिल कर करते. बच्चों ने खूब मस्ती की.

Vila Esperança, Indigenous culture festival, Brazil

नृत्य के बाद बच्चों को छोटे छोटे गुटों में बाँट दिया गया. कोई जनजातियों की कला सीखने गया, कोई जनजातियों में आभूषण कैसे बनाते हैं यह सीखने. कोई मूर्तियों को बनाने की कला सीख रहा था, तो कोई सूखी घास से वस्त्र कैसे बनायें यह सीख रहा था. एक घँटे तक बच्चे इस तरह अलग अलग गुटों में कुछ न कुछ सीखते रहे.

इसके बाद सब बच्चे वापस चकौराकार भवन में एकत्रित हुए, जहाँ रोबसन ने पहले प्रकृति को प्रसाद चढ़ाया फ़िर सब बच्चों को खाने को मिला. प्रसाद के खाने में उबला हुआ भुट्टा, केला, तरबूज आदि थे और पीने के लिए अनानास का रस था. इसके साथ ही "जनजाति सभ्यता" का कार्यक्रम समाप्त हुआ.

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दोपहर को मैं रोबसन के साथ बैठा बात कर रहा था. रोबसन ने "विल्ला स्पेरान्सा" (Vila Esperança) यानि "आशा घर" नाम की संस्था बनायी है, जहाँ हर सप्ताह इस तरह के कार्यक्रम होते हैं जिनमें जनजातियों या अफ्रीकी सभ्यताओं के गीतों, कहानियों, नृत्यों, कलाओं, आदि के बारे में बच्चों को सिखाया जाता है.

रोबसन बोला, "मैं देखने में युरोपीय लगता हूँ लेकिन मेरे परिवार में अफ्रीकी और यहाँ के मूल निवासियों की जनजातियों का खून भी है. यूरोप से आये लोगों के खून से घुलने मिलने से हमारे परिवार जैसे बहुत परिवार हैं ब्राज़ील में, जिनमें कुछ लोग यूरोप के लगते हैं, कुछ अफ्रीका के और कुछ जनजातियों के. लेकिन हमारे देश में यूरोपीय सभ्यता को उच्च समझा जाता है, और जनजाति तथा अफ्रीकी सभ्यताओं को निम्न. हर कोई अपने आप को यूरोपीय दिखाना चाहता है. जिसका चेहरा यूरोपीय लोगों की तरह गोरा है वह अपने परिवार के अफ्रीकी और जनजाति वाले हिस्से को छुपाने की कोशिश करते हैं. जिनके चेहरे और रंग में अफ्रीकी या जनजाति का प्रभाव स्पष्ट होगा तो वह इस भेदभाव को छोटी उम्र से ही महसूस करते हैं. यह नीचा होने की भावना, हीन भावना बचपन से ही मन में घर कर लेती है, इसे निकालना बहुत कठिन है. हमें बचपन से ही शिक्षा मिलती है कि अपनी अफ्रीकी और जनजाति मूल सभ्यता को भूल जाओ, बस यूरोपी सभ्यता को मान्यता दो."

Vila Esperança, Indigenous culture festival, United colours of Brazil

इसी भावना के विरुद्ध काम करने की सोची रोबसन ने और "आशा घर" को 1989 में संस्थापित किया. वह बोला, "वैसे तो बहुत सी किताबों में, बातों में कहते हैं कि रंग और सभ्यता का भेदभाव करना गलत बात है, लेकिन वे केवल बातें हैं. हमारे घरों परिवारों में, हमारे आम जीवन में, टीवी पर दिखाये जाने वाले कार्यक्रमों में, विज्ञापनों में, हमारा समाज कुछ और संदेश देता है, जो कहता है कि काला रंग या अफ्रीकी चेहरा या जनजाति के नाकनक्श का अर्थ हीनता, नीचापन है."

हाँ, हमारे भारत में भी बिल्कुल यही बात है, मैंने रोबसन को बताया. भारत में अगर आप का काला रंग हो या जाति की वजह से, हमारे समाज में हर ओर से छोटी उम्र से ही यही संदेश मिलता है कि तुम नीचे हो, तुममे कमी है. उस पर भारत में भाषा से जुड़ी हीन भावना भी है, अगर अंग्रेज़ी न बोलनी आये तो तुममे कुछ भी करने की शक्ति नहीं है यह कहते हैं. नर्सरी स्कूल से ही बच्चों को अंग्रेज़ी की कवितायें याद करायी जाती हैं.

रोबसन बोला, "हमारी मूल भाषाएँ तो अब लुप्त ही हो गयी हैं, सभी केवल पोर्तगीज़ भाषा बोलते हैं, जिन्होंने हमारे देश पर राज किया. कुछ जनजाति की प्राचीन भाषाओं के शब्द उनके धार्मिक रीति रिवाज़ों के साथ जुड़ी प्रार्थनाओं में बचे हुए हैं लेकिन आज उन शब्दों के अर्थ कोई नहीं जानता. इसलिए मेरे लिए 'आशा घर'  का यह कार्यक्रम बहुत महत्वपूर्ण है कि केवल बात न की जाये, बल्कि बच्चे यहाँ आ कर अपनी अफ्रीकी और जनजाति की सभ्यताओं को स्वीकार करें. यह समझें कि यह गीत, कहानियाँ, मिथक, नृत्य आदि हीन नहीं हैं, इनकी अपनी गरिमा है. कोई ऊँचा नीचा नहीं, बल्कि हमें अपने अंदर दौड़ रहे अफ्रीकी और जनजातियों के खून पर गर्व होना चाहिये."

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रोबसन से बात करने के कुछ देर बाद मेरी बात रेजीमार से हुई जो कि 'आशा घर' द्वारा चलाये जाने वाले प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक है. रेजीमार अफ्रीकी मूल का है. उसने कहा, "अन्य जगह बात बराबरी की होती है, कि हम सब एक बराबर हैं, कोई ऊँचा नीचा नहीं, लेकिन वह सिर्फ़ कहने की बाते हैं. यहाँ 'आशा घर' में इन विचारों को कहने की नहीं, जीने की कोशिश है. इस तरह जियो कि हर इन्सान की गरिमा को महत्व दो. यह नहीं कहता कि समाज में हर कोई भेदभाव करता है लेकिन अगर अन्य लोग भेदभाव न भी करें, तो हमारे अपने मन में हीन भावना इतनी गहरी होती है कि हम स्वयं भीतर से अपने आप को अन्य लोगों के बराबर नहीं मानते. इसलिए बच्चों के साथ काम करना बहुत महत्वपूर्ण है, जिससे उनके अन्दर वह हीन भावना न पनपे."

"लेकिन अगर स्कूल में बराबरी का महत्व समझ में आ भी जाये तो स्कूल के बाहर का असर उससे रुक सकेगा? बच्चे स्कूल से बाहर जायेंगे तो खेल के मैदान में, घर में, वहीं भेदभाव वाला समाज नहीं मिलेगा उन्हें?" मैंने पूछा.

"हमारा स्कूल अन्य स्कूलों से भिन्न है, हमारे यहाँ बच्चे शिक्षा का केन्द्र हैं न कि शिक्षक या फ़िर किताबें. हम कोशिश करते हैं कि बच्चों में प्रश्न पूछने, अपने उत्तर स्वयं खोजने की क्षमता दें. बच्चा कुछ भी पूछ सकता है, कुछ भी कह सकता है. हमारे बच्चे एक बार दुनिया को अपनी तरह से समझने का तरीका सीख लेते हैं तो घर परिवार, समाज हर जगह इसका असर पड़ता है. पंद्रह साल हो गये मुझे यहाँ पढ़ाते, इन सालों में इतनी बार औरों से अपनी आलोचना सुनी है कि 'आप के स्कूल के बच्चे प्रश्न बहुत पूछते हैं, टीचर कुछ भी कहे उसे यूँ ही नहीं मान लेते' तो मुझे बहुत गर्व होता है. मैं सोचता हूँ कि हमारे बच्चे बाहर के हर भेदभाव से लड़ सकते हैं, इतना आत्मविश्वास बन जाता है उनका."

24 अगस्त, 2012, गोईयास वेल्यो

सुबह उठा तो बाहर सैर करने की सोची. हमारे होटल के बिल्कुल साथ में नदी बहती है, रियो वेरमेल्यो (Rio Vermelho), यानि "सिँदूरी नदी". सैर करते हुए उसी नदी के किनारे पहुँच गया. नदी के ऊपर एक पुराना कुछ टूटा हुआ सा पुल था, जिसके पीछे एक झरना भी दिख रहा था. बहुत सुन्दर जगह थी. आसपास कोई था भी नहीं, बस एक बूढ़े से खानाबदोश किस्म के व्यक्ति दिखे जो अपने दो कुत्तों के साथ घूम रहे थे. उन्होंने मेरी ओर देखा तक नहीं, अपने में ही मग्न थे. आधे घँटे तक वहीं झरने के पास बैठा रहा, कुछ तस्वीरें खींचीं. रात को नींद ठीक नहीं आयी थी, लेकिन उस आधे घँटे में सारी थकान दूर हो गयी.

Rio Vermelho, Goias Velho, Brazil

वापस होटल पहुँचा तो जी भर के नाश्ता खाया. नाश्ते में इमली का खट्टा सा रस भी था जो मुझे बहुत अच्छा लगा. इतनी अलग अलग तरह के फ़ल मिलते हैं यहाँ, जो दुनियाँ में अन्य कहीं नहीं देखे जैसे माराकुजा और कुपुआसू. और उनका स्वाद भी बहुत बढ़िया है. नाश्ते में इतना खाया कि बाद में अपने पर खीज आ रहा थी. अपने को रोकने की और संयम की शक्ति मेरी बहुत कम है.

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"आशा घर" में पढ़ने वाले एक बच्चे के पिता से बात हुई तो उसने एक अन्य बात बतायी. बोला, "इस स्कूल के बारे में शहर में बहुत से गलत बातें कही जाती हैं कि यहाँ धर्म बदल देते हैं. इसलिए यहाँ बहुत से लोग अपने बच्चे को नहीं भेजना चाहते. मैं इस बात को नहीं मानता. मेरे बच्चों ने कोई धर्म नहीं बदला, बल्कि यहाँ की शिक्षा ने उन्हें सोचने समझने की ताकत दी है. मेरा बड़ा बेटा अब विश्वविद्यालय में पढ़ता है, वह यहीं से पढ़ा है. वह कहता है कि इस स्कूल में पढ़े दिन उसके जीवन के सबसे सुन्दर दिन थे और उसने जो यहाँ सीखा है उससे उसका दिमाग और चरित्र दोनो बने हैं."

बाद में मैंने यह बात रोबसन से पूछी कि अन्य धर्म वाले तुमसे नाराज़ क्यों हैं? वह बोला, "मैं कन्दोमब्ले धर्म में विश्वास करता हूँ जो कि अफ्रीकी मूल के आये लोगों के मूल धर्म से प्रेरित है. अफ्रीकी गुलामों को यहाँ ला कर उन्हें ईसाई बनाया गया, लेकिन उन्होंने अपने मूल धर्म को छुपा कर बचाये रखा. आज का कन्दोमब्ले उनके पुराने अफ्रीकी धर्म से साथ ईसाई धर्म और यहाँ रहने वाले मूल जनजाति के निवासियों के धर्म के सम्मिश्रण से बना है. हमारे धर्म के अनुसार पृथ्वी की हर वस्तु, पेड़ पौधे, पहाड़ पत्थर, मानव और पशु पक्षी, सबमें एक ही परमात्मा है. 'आशा घर' की बहुत से कार्यक्रम मेरे धर्म के विश्वास से प्रभावित हैं लेकिन हमारे यहाँ कैथोलिक, एवान्जेलिक सब धर्मों के लोग काम करते हैं, सब धर्मों के बच्चे पढ़ते हैं, मैंने कभी किसी का धर्म बदलने की कोशिश नहीं की. मैं उनके धर्म का मान करता हूँ क्योंकि अगर सोचोगे कि हर वस्तु में वही परमात्मा है तो कोई तुमसे भिन्न नहीं, तो मैं उनके विरुद्ध कैसे कुछ कह या कर सकता हूँ? लेकिन यहाँ के कैथोलिक और एवान्जेलिक लोग हमारे विरुद्ध प्रचार करते हैं कि हम बच्चों का धर्म बदलना चाहते हैं."

मैं सोच रहा था कि दुनिया के दो कोनों पर हैं भारत और ब्राज़ील, लेकिन फ़िर भी कितनी बातों में हमारी समस्याएँ एक जैसी हैं! रोबसन ने कहा कि उन पर यह भी आरोप लगाया जाता है कि वह बच्चों से ईसाई धर्म की आलोचना की बातें करते हैं.

मेरे विचार में यह सोचना कि कोई अन्य तुम्हारे भगवान की या पैगम्बर की आलोचना या बुराई कर सकता है, यह बात असम्भव है. क्योंकि भगवान या पैगम्बर इतने कमज़ोर नहीं हो सकते कि किसी के कुछ कहने, लिखने या चित्र बनाने से उनकी बेइज़्ज़ती हो जाये. यह तो मानव के अपने मन की असुरक्षा की भावना है जो यह सोच सकती है. दूसरी ओर बात है धर्म के नाम पर लोगों को उल्लू बनाना या उनको दबाना और उनके मानव अधिकार और गरिमा का शोषण करना. धर्म के नाम पर जो लोग इस तरह की बात करते हैं उसकी आलोचना करना तो मेरे विचार में भगवान की पूजा के बराबर होगी.

पर यह सच है कि दुनिया के बहुत से देशों में बहुसंख्यकों के धर्म की रक्षा के नाम पर दूसरे अल्पसंख्यक धर्मों के लोगों के साथ अन्याय होता है, उन्हें दबाया जाता है. बहुत से देशों ने तो कानून भी बनाये हैं जहाँ धर्म की बेइज़्ज़ती के नाम पर लोगों को कारावास या मृत्यू दँड तक दे देते हैं.

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इस बार पोर्तगीज़ बोलने में मुझे अधिक कठिनाई हो रही है!

आखिरी बार पोर्तगीज़ यहीं ब्राज़ील में ही बोली थी, करीब चौदह महीने पहले. उसके बाद किसी पोर्तगीज़ भाषा के देश में जाने का मौका नहीं मिला. शायद इस लिए भाषा को कुछ जंग सा लग गया. या फ़िर उम्र का असर है.

एक अन्य कारण भी हो सकता है इसका, मेरा ईबुक रीडर! पहले कोई भी यात्रा हो साथ में एक किताब तो अवश्य होती थी, लेकिन नये देश में जा कर, वहाँ के समाचार पत्र पढ़ना, टीवी देखना, लोगों से बातें करना, इस सबसे भाषा का अभ्यास तुरंत शुरु हो जाता था. इस बार ईबुक रीडर है जिसमें 153 किताबें हैं, बस हर समय उसी में मग्न रहता हूँ. शायद इसी लिए इस बार पोर्तगीज़ भाषा को ठीक से  बोलने में इतनी कठिनायी हो रही है.

26 अगस्त 2012, गोईयानिया

कल शाम को गोईयास वेल्यो से वापस आये. आज रविवार को मैं खाली था. सुबह सुबह शहर का नक्शा ले कर निकल पड़ा कि धूप तेज़ होने से पहले शहर में कुछ नया देखा जाये.

रास्ते में एक बाग में छोटा उल्लू का बच्चा दिखा जो तेज़ स्वर में पुकार रहा था. शायद उसके माता पिता उसके खाने की खोज में ही गये थे. मैं तस्वीर खींचने के लिए करीब गया तो एक पत्थर के नीचे खुदे खड्डे में दुबक गया.

Baby owl, Goiania, Brazil

आजकल ब्राज़ील के राष्ट्रीय फ़ूल इपे के खिलने का मौसम है. इपे के अधिकतर पेड़ों में पत्ते नहीं हैं बस फ़ूलों से भरे हैं. बागों में गुलाबी, जामुनी, पीले, नीले, विभिन्न रंगों के इपे दिखते हैं.

Ipé tree, Goiania, Brazil

घूमते घूमते विश्वविद्यालय वाले इलाके में पहुँच गया, जहाँ एक बाग में ब्राज़ीली शिल्पकारों की बनायी बहुत सी मूर्तियाँ लगीं थीं. मिट्टी की बनी एक कलाकृति मुझसे सबसे अच्छी लगी, पर शायद विश्वविद्यालय के छात्रों को एक हाथ की कलाकृति सबसे अधिक पसंद थी जिसके ऊपर उन्होंने अपने संदेश लिख दिये थे. उस हाथ की कलाकृति के अतिरिक्त किसी अन्य कलाकृति को लिख कर नहीं बिगाड़ा गया था.
Terracotta Sculptures University square, Goiania, Brazil

Hand Sculpture university square, Goiania, Brazil

तीन घँटे तक चला, जब वापस होटल पहुँचा तो टाँगें थकान से चूर हो रही थीं. फ़िर भी खाना खा कर होटल के करीब एक बाग में लगे चित्रकला बाज़ार में गया, क्योंकि वहाँ अपने एक पुराने मित्र तादेओ से मिलना चाहता था. तादेओ भी चित्रकार है और कुछ वर्ष पहले खरीदी उसकी एक कलाकृति बोलोनिया में हमारे घर में भी लगी है जो मुझे बहुत अच्छी लगती है. तादेओ को बचपन में कुष्ठ रोग हुआ था, जिसकी वजह से उन्हें उनके परिवार से हटा कर कुष्ठ रोगियों की कोलोनी में रहना पड़ा, परिवार भाई बहनों से उनके सब नाते टूट गये. आज वह बात नहीं है क्योंकि अब कुष्ठ रोग का उपचार आसान है इसलिए किसी को उसके परिवार से निकाल कर कोलोनी में बन्द करने वाली बातें अब नहीं होतीं. सोचा था कि तादेओ की एक अन्य पैंटिंग खरीदूँगा, लेकिन बाज़ार में तादेओ नहीं दिखा. अन्य चित्रकारों से पूछा तो उसके एक मित्र ने बताया कि उसकी तबियत ठीक नहीं थी.

Ashwarya Rai in art market, Goiania, Brazil

चित्रकला बाज़ार में भारत की एश्वर्या राय भी दिखीं. एक कलाकार ने उनकी बड़ी तस्वीर पर चमकते सितारे और मोती टाँक कर तस्वीर बनायी थी जिसे लोग दिलचस्पी से देख रहे थे और किसकी तस्वीर है यह पूछ रहे थे.

अब नींद आ रही है, जल्दी सोना चाहिये क्योंकि कल सुबह सुबह बेलेन जाने की उड़ान लेनी है.

27 अगस्त 2012, बेलेम

आज दोपहर को बेलेम पहुँचे. होटल बस अड्डे के सामने है. मैं सामान आदि रख कर घूमने निकला, सोचा था कि यहाँ के एक संग्रहालय और बाग में घूमूँगा लेकिन सोमवार होने की वजह से दोनो ही बन्द थे. शाम को खाना खाने हम लोग पुरानी बँदरगाह की ओर गये जहाँ पुराने गौदामों में नये रेस्टोरेंट, दुकाने आदि खोली गयी हैं. वहीं एक "किलो रेस्टोरेंट" में खाना खाया. किलो रेस्टोरेंट में आप अपनी प्लेट में कुछ भी खाना ले लेजिये, बाद में उसके वजन के हिसाब से उसकी कीमत चुकाईये. इस तरह अगर आप चाहे तो केवल चावल सब्जी खाईये नहीं तो केवल माँस मछली, उससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता, बस वजन के हिसाब से कीमत लगेगी. शहर के अधिकतर किलो रेस्टोरेटों में 20 या 22 रियाइस यानि 500 या 550 रुपये प्रति किलो की कीमत होती है लेकिन बँदरगाह के नये शापिंग सेंटर की कीमत दुगनी थी, फ़िर भी खाना अच्छा था.

मैंने खाने के साथ खूब आम भी खाये. इस साल बोलोनिया में कई बार आम खोजने गया था पर नहीं मिले थे, केवल चटनी वाले कच्चे आम मिलते थे. वहीं छत पर लटकते चबूतरे पर बैठ कर एक युवक गिटार बजा रहा था और साथ गीत गा रहा था, वही चबूतरा भवन में इधर उधर घूम रहा था.

खाना खा कर यहाँ कि पुराने पुर्तगाली किले और उसके सामने बने कैथेड्रल को देखने गये. सफ़ेद रंग का कैथेड्रल, सफेद और लाल रोशनियों से सजा, रात के अँधेरे में बहुत सुन्दर लग रहा था.

Cathedral, Belem, Brazil

मेरे साथ यहाँ आयी ब्राज़ीली साथी दियोलिँदा यहीं नदी के बीच में एक द्वीप में पैदा हुई थी. वह अपने बचपन की साठ साल पहले की बातें बता रही थी कि कैसे यहाँ सड़क नहीं थी और वह अपनी माँ के साथ बाग में लगने वाले हाट में खाने का सामान बेचने आती थी. उसकी माँ अफ्रीकी मूल की थीं और पिता एक फ्राँसिसी और अमेज़न जनजाति के सम्मिश्रित. उसके परिवार में गोरे, काले, हर रँग और नस्ल के दिखने वाले लोग हैं. उसके अपने बच्चों में भी अफ्रीकी रँग और चेहरे वाले भी हैं और सुनहरे बालों वाले यूरोपीय दिखने वाले भी.

गोयानिया में आकाश इतना नीला दिखता था मानो शेम्पू से धोया हो. यहाँ का आसमान उसके मुकाबले में कुछ मटमैला सा है.

Bosque do Buritis lake, Goiania, Brazil

कल सुबह अबायतेटूबा यानि "भीमकाय लोगों का गाँव" जाना है जो कि अमेज़न जँगल के बीच में बसा है. राज्य स्वास्थ्य विभाग की गाड़ी आयेगी हमें लेने, और आधा रास्ता नाव में नदी पार करने का होगा. वहाँ पिछले वर्ष भी गया था. लोग सागर जैसे नदी के बीच में अलग अलग द्वीपों में रहते हैं.

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(अंत भाग 01)

मंगलवार, मई 08, 2012

हवा में तैरती हुई हरी नदी


प्राचीन संसार के सात अजूबों में से एक अजूबा था बेबीलोन के झूलते बाग. यह सचमुच के बाग थे या मिथक यह कहना कठिन है क्योंकि इन बागों के बारे में कुछ प्राचीन लेखकों ने लिखा अवश्य है लेकिन इनका कोई पुरात्तव अवशेष नहीं मिल सका है. प्राचीन कहानियों के अनुसार इन बागों को आधुनिक ईराक के बाबिल जिले में ईसा से 600 सौ वर्ष पूर्व बेबीलोन के राजा नबुछडनेज़ार ने अपनी पत्नी के लिए बनवाया था, जिसमें राजभवन में विभिन्न स्तरों पर पत्थरों के ऊपर बाग बनवाये गये थे.

न्यू योर्क में सड़क से ऊँचे स्तर पर बनी पुरानी रेलगाड़ी की लाईन पर बाग बनाने की प्रेरणा शायद बेबीलोन के झूलते बागों से ही मिली थी.

न्यूयोर्क में मेनहेटन के पश्चिमी भाग के इस हिस्से में विभिन्न फैक्टरियाँ और उद्योगिक संस्थान थे, जिनके लिए 1847 में पहली वेस्ट रेलवे की लाईन बनायी गयी थी जो सड़क के स्तर पर थी. रेलगाड़ी से फैक्टरियों तथा उद्योगिक संस्थान अपने उत्पादन सीधा रेल के माध्यम से भेज सकते थे. लेकिन उस रेलवे लाईन की कठिनाई थी कि वह उन हिस्सों से गुज़रती थी जहाँ बहुत से लोग रहते थे, और आये दिन लोग रेल से कुचल कर मारे जाते थे. इतनी दुर्घटनाएँ होती थीं कि इस इलाके का नाम "डेथ एवेन्यू" (Death avenue) यानि "मृत्यू का मार्ग" हो गया था.

Highline park New York - old line

तब इन रेलगाड़ियों के सामने लाल झँडी लिए हुए घुड़सवार गार्ड चलते थे ताकि लोगों को रेल की चेतावानी दे कर सावधान कर सकें, जिन्हें "वेस्टसाईड काओबायज़" के नाम से बुलाते थे. (यह पुरानी तस्वीरें हाईलाईन की वेबसाईट से हैं.)

Highline park New York - cow boys

1929 में शहर की नगरपालिका ने यह निर्णय लिया कि यह रेलवे लाईन बहुत खतरनाक थी और दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सड़क से उठ कर ऊपरी स्तर पर नयी रेल लाईन बनायी जाये. 1934 में यह नयी रेलवे लाईन तैयार हो गयी और इसने 1980 तक काम किया, हालाँकि इसके कुछ हिस्से तो 1960 में बन्द कर दिये गये थे.

फ़िर समय के साथ शहर में बदलाव आये और इस रेलवे लाईन के आसपास बनी फैक्टरियाँ और उद्योगिक संस्थान एक एक करके बन्द हो गये. बजाय रेल के अधिकतर सामान ट्रकों से जाने लगा. शहर का यह हिस्सा भद्दा और गन्दा माना जाता था. वहाँ अपराधी तथा नशे की वस्तुएँ बेचने वाले घूमते थे, इसलिए लोग शहर के इस भाग में रहना भी नहीं चाहते थे.

तब कुछ लोगों ने, जिन्होंने रेलवेलाईन के नीचे की ज़मीन खरीदी थी, नगरपालिका से कहा कि ऊपर बनी रेलवेलाईन को तोड़ दिया जाना चाहिये ताकि वे लोग उस जगह पर नयी ईमारते बना सकें.लेकिन 1999 में वहाँ आसपास रहने वाले लोगों ने न्यायालय में अर्जी दी कि रेलवे लाईन के बचे हुए हिस्से को शहर की साँस्कृतिक और इतिहासिक धरोहर के रूप में संभाल कर रखना चाहिये और तोड़ना नहीं चाहिये. 2003 में एक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया कि पुरानी सड़क के स्तर से ऊँची उठी रेलवे लाईन का किस तरह से जनहित के लिए प्रयोग किया जाये. इस प्रतियोगिता में एक विचार यह भी था कि पुरानी रेलवे लाईन पर एक बाग बनाया जाये, जिसका कला और साँस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए प्रयोग किया जाये.

इस तरह से 2006 में हाईलाईन नाम के इस बाग का निर्माण शुरु हुआ. अब तक करीब 1.6 किलोमीटर तक की रेलवे लाईन को बाग में बदला जा चुका है. इसके कई हिस्सों में पुरानी रेल पटरियाँ दिखती हैं, जिनके आसपास पेड़ पौधै और घास लगाये गये हैं, साथ में सैर करने की जगह भी है. दसवीं एवेन्यू के साथ साथ बना यह बाग मेनहेटन के 14वें मार्ग से 30वें मार्ग तक चलता है. अगर आसपास के किसी गगनचुम्बी भवन से इसको देखें तो यह परानी रेलवे लाईन शहर के बीच तैरती हुई हरे रंग की नदी सी लगती है.

Highline park New York - S. Deepak, 2012

इस बाग की वजह से शहर के इस हिस्से की काया बदल गयी है. आसपास के घरों की कीमत बढ़ गयी और पुरानी फैक्टरियों को तोड़ कर उनके बदले में नये भवन बन रहे हैं. बाग दिन भर पर्यटकों से भरा रहता है.

इस बाग की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं.

Highline park New York - S. Deepak, 2012

Highline park New York - S. Deepak, 2012

Highline park New York - S. Deepak, 2012

Highline park New York - S. Deepak, 2012

Highline park New York - S. Deepak, 2012

Highline park New York - S. Deepak, 2012

Highline park New York - S. Deepak, 2012

जिस दिन मैं बाग देखने गया, वहाँ "लिलिपुट कला प्रदर्शनी" लगी थी जिसमें विभिन्न कलाकारों ने भाग लिया था. इस कला प्रदर्शनी की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं.

Highline park New York - S. Deepak, 2012

Highline park New York - S. Deepak, 2012

Highline park New York - S. Deepak, 2012

कुछ ऐसा ही स्पेन में वालैंसिया शहर में भी हुआ था. वहाँ तुरिया नदी शहर में हो कर गुज़रती थी. 1957 में नदी में बाढ़ आयी और शहर को बहुत नुकसान हुआ, तब यह निर्णय किया कि नदी का रास्ता बदल दिया जाये जिससे नदी शहर के बीच में से न बहे. शहर में जहाँ नदी बहती थी, वहाँ "तुरिया बाग" बनाया गया, जो शहर के स्तर से नीचा है. (नीचे तुरिया बाग की यह तस्वीर विला ज़समीन के वेबपृष्ठ से)

Turiya river park Valencia, Spain

जब नागरिक जागरूक हो कर अपने शहरों की प्राकृतिक, साँस्कृतिक और इतिहासिक सम्पदा को बचाने की ठान लेते हैं, तो उसमें सभी का फायदा है.

काश हमारे भारत में भी ऐसा हो. गँगा, जमुना, नर्मदा जैसी नदिया हों, प्रकृतिक सम्पदा से सुन्दर शिमला या मसूरी के पहाड़ हों या दिल्ली शहर के बीच में प्राचीन पहाड़ी, हर जगह खाने खोदने वाले, उद्योग लगाने वाले, प्राईवेट स्कूल चलाने वाले, मन्दिर, मस्जिद गुरुद्वारे बनवाने वाले, हाऊसिंग कोलोनियाँ बनवाने वालों के हमले जारी हैं, जिनके सामने राजनीति आसानी से बिक जाती है. इनकी रक्षा के लिए हम सब जागें, जनहित के लिए लड़ें, यह मेरी कामना है.

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